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सोमवार, 28 दिसंबर 2009

मानो या ना मानो हम सब बेहया है

अजय कुमार सिंह

कोटला में घटिया पिच की वजह से मैच रद्द करना पड़ा तो केन्द्र सरकार को हरियाणा के 'घटिया' पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर से राष्ट्रपति मेडल वापस लेना पड़ा। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे और अभी आंध्र प्रदेश के लाट साहब पूरी जवानी नहीं पकड़ाए लेकिन बुढ़ापे में वही हरकतें छीछालेदर का कारण बन गईं। सत्ता लोलुप भाजपाइयों ने सिबू सोरेन को मुख्यमंत्री बनाने का एलान कर दिया तो चार सौ से ज्यादा करोड का घोटाला करके भी मधु कोड़ा अपनी बीबी के साथ चुनाव जीत गए। क्या अब भी कोई कसर बाकी है ये साबित करने के लिए कि हम सब भारतवासी बेहयाई के मामले में बिल्कुल भाई-भाई हैं। मानो या ना मानो-हम सब बेहया हैं भाई। अमेरिका ने हमे अच्छा पहचाना। तभी तो हेडली के मामले में भी साफ-साफ कह दिया कि कम से कम दो सौ साल बाद वो हेडली को भारत के हवाले करने के बारे में सोचेगा। हम हैं ही इसी लायक। क्या आपको याद है कि पुरुलिया में विमान से हथियार गिराने वालों में से एक अमेरिकी नागरिक को हमने अमेरिका के एक इशारे पर बाइज्ज़त छोड़ दिया था। लेकिन अमेरिका को क्या पड़ी है कि हमारे मुंबई में २६ नवम्बर २००८ को तबाही मचाने की साजिश में शामिल हेडली को हमारे हवाले करे। हम ही कौन सा उसे तब पकड़ पाए जब वो मुंबई से लेकर गोवा और दिल्ली तक लड़कियों के साथ घूमता रहा। भारतियों को अमेरिका से भगाने सम्बन्धी ओबामा के विचारों से भला कौन नहीं वाकिफ। लेकिन ओबामा राष्ट्रपति क्या बने हमारे यहाँ ७० साल के मुलायम और ५३ साल की मायावती भी ख़ुद को 'उभरता हुआ ओबामा' बताने लगीं। कुछ ही दिन हुए जब ओबामा चाइना गये और मुह फाड़कर बोल आये कि चाइना को कश्मीर के मसले पर मध्यस्थता करनी चाहिए "। चाइना ने लद्दाख में जरा सी गर्मी दिखाई और नरेगा के तहत बन रही सड़क रूक गई। एक न्यूज़ चैनल पर मैंने देखा, 'ड्रैगन हमारी सड़क से डर गया।' क्या अब भी यकीन नहीं होता कि हम सब बेहया हैं तो आईये देखिये कि किस तरह मुंबई एटीएस के पूर्व प्रमुख हेमंत करकरे की शहादत का सच सामने ना आने पाए इसलिए उनकी बुलेट प्रूफ जाकेट गायब कर दी गई। किस तरह एक सफाई कर्मचारी ने अदालत में कहा कि उसने ये जाकेट कूड़ेदान में दाल दी थी। आइये जाने कि किस तरह जेसिका लाल का हत्यारा मनु शर्मा दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीछित की मेहरबानी से पैरोल पर छूटा और फ़िर अय्याशी में भिड गया। जरा जानिए कि कैसे सीबीआई ने निठारी में छोटे-छोटे बच्चों से दुष्कर्म करके उन्हें कुकर में पका कर खा जाने वाले ड्रैकुला मोहिंदर सिंह पंधेर को बचा लिया। इसीलिए ना क्योंकि पंधेर एक दिन में एक लाख से ज्यादा रुपये कमाता है। अब भी अगर आपको हम सब के बेहया होने पर शक हो तो आज़ादी के बाद से आज तक बने जांच आयोगों की कथनी-करनी पर नज़र डाल लीजिये। अरे दूर क्यों जाते हैं अपने काले चश्मे वाले लिब्राहन साहब को देखिये ना। कैसे सालों अयोध्या काण्ड की जाँच के नाम पर दाना-पानी उठाते रहे और जब रिपोर्ट दी तो उसमे अयोध्या काण्ड के बजाये किष्किन्धा काण्ड का विवरण था। पता ही नहीं चला कि कौन कहाँ कूदा, किसने किससे क्या कहा और आखिरकार जो कुछ हुआ वो किसके कर्म या कुकर्म का प्रतिफल था। हरी अनंत हरी कथा अनंता। हमारी बेहयाई के नमूनों की कोई कमी नहीं। हर प्रदेश , हर जिला, हर मोहल्ले और हर गाँव में हमारी बेहयाई के बेशुमार नमूने बिखरे पड़े हैं। गोरखपुर मंडल में एन्सफ्लाईटिस से पिछले ३१ सालों में ५० हज़ार से ज्यादा बच्चे मर गए। विश्व बैंक गोबर की खाद वाली उसी जैविक खेती के लिए एनजीओज को अरबों रुपये अनुदान-क़र्ज़ दे रहा है जो सदियों से हमारी परम्परा में शामिल रहा है। श्वशुर पतोहू की कौन कहे बाप-बेटी, भाई-बहन के रिश्ते कलंकित हो रहे हैं। क्या अब भी कोई सबूत बाकी है कि हम सब बेहया हैं। अगर आपको अब भी कोई सुबह हो तो ३१ दिसम्बर की रात किसी भी शहर के किसी भी होटल में चले जाइएगा । बावजूद इसके कि हमारे यहाँ ७० फीसदी लोग भूखे-नंगे हैं बड़ी बेहयाई हममे से ३० फीसदी भरे-पूरे लोग एक-एक सीट बुक कराने के लिए हज़ारों खर्च करते नज़र आ जायेंगे। ऐसी जगहों पर बच्चे-बूढ़े-जवान हर उमर के लोग अधनंगी नाचती लड़कियों को देखकर मस्ती में झूमते नज़र आ जायेंगे। उनकी हरकतें देखकर शायद आपको यकीन हो जाए कि हम सब बेहया हैं।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

रिपोर्टर-एंकर-एडिटर कंडोम नहीं होते

अजय कुमार सिंह
कभी ईटीवी में साथी रहे वीओआई के सीनिअर प्रोड्यूसर अशोक उपाध्याय ऑफिस में काम के दौरान ही मौत की नींद सो गये। कहने वाले कह रहे हैं कि इसके लिए वीओआई में जन्म से ही मची उथलपुथल जिम्मेदार है। यह बिल्कुल सही भी है। अशोक जी के बारे में ये कहा जाता है कि वे बेहद अंतर्मुखी थे। अपने काम से काम रखते, बुरे से बुरे हालत में भी धैर्य नहीं छोड़ते , बल्कि साथियों को सान्तवना देते थे। अशोक जी अपने पीछे पत्नी और 11साल का एक बेटा छोड़ गये है। वीओआई के नए प्रबंधन ने उनके परिवार को पाँच लाख रुपये तत्काल देने का एलान किया है। वीओआई के चैयरमेन अमित सिन्हा ने भरोसा दिलाया है कि दुःख की इस घड़ी में पूरा वीओआई परिवार अशोक जी के परिवार के साथ है। अशोक जी के बाद उनके परिवार के लिए इसके सिवा भला कोई और कर भी क्या सकता है। और फ़िर सच तो ये है कि कोई कुछ भी कर ले अब ना तो अशोक जी कभी लौटेंगे और ना ही उनके बीबी बेटे की जिंदगी का खालीपन कभी भर पायेगा। जो नुक्सान होना था वो हो चुका है। अब तो सिर्फ़ जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश भर हो सकती है। अशोक जी जब हैदराबाद में थे तब मैं भी अक्सर मीटिंग के लिए वहां जाया करता था। हैदराबाद में उडीसा, बंगाल, कर्नाटक, महारास्त्र, मध्ये प्रदेश, गुजरात और देश के लगभग सभी जगहों से लोग होते थे।
उनमे से कई मुझे इस वजह से पहचानते थे क्योंकि मेरी खबरें चर्चित और पीटीसी ज़ोरदार हुआ करती थी। लेकिन अशोक जी को मैं पहचानता था क्योंकि वो ईटीवी के अच्छे एंकरों में थे। अशोक जी से कभी लम्बी बातचीत का मौका नहीं आया लेकिन उनकी ख़ुशमिज़ाजी का एहसास उन्हें देखकर ही लग जाता था। मुस्कुराते अशोक जी को देखकर लगता था जैसे पत्रकारिता के उतार चढाव से अच्छी तरह वाकिफ होंगे और लंबे कैरिएर में सारा तजुर्बा हासिल कर चुके होंगे। अशोक जी ने ईटीवी मेरे कुछ दिन बात ही छोड़ा। मैं लखनऊ में था। वे हैदराबाद में। हम दोनों एक ही चैनल में थे। चैनल छोड़ने के पीछे दोनों का मकसद भी एक ही था, कैरीएर में बेहतरी। लेकिन ना उन्हें मेरे बारे में मालूम था ना मुझे उनके बारे में। दरअसल ईटीवी में हम जैसे कई लोगों ने उसी अंतराल में चैनल छोड़ा था। ज्यादातर ने वीओआई ज्वाइन किया और मैंने इंडिया न्यूज़। वीओआई में हालात बहुत ख़राब रहे। लगातार बुरी खबरें आती रहीं। पिछले लोकसभा चुनाव के आते-आते तो हालात कई जगह ख़राब हो गए। अशोक जी को देखकर इतना नहीं लगता था लेकिन आज लगता है कि अशोक जी बेहद संवेदनशील रहे होंगे। वैसे संवेदनशील तो ईटीवी छोड़ने वाले हममे से ज्यादातर हैं। लेकिन मुझमे अशोक जी जितनी सहनशीलता नहीं है। वैसे मैं यह भी मानता हूँ कि दुनिया में कोई भी ऐसी चीज़ नहीं जिसके लिए चार दिन की इस जिंदगी को मनहूस बना लिया जाए। खूब काम करना, इमानदारी बरतना , बड़ों की इज्ज़त करना, अनुशासन का पालन करना और संगठन की अपेछाओं से ज्यादा देना, मेरे खून में हैं। लेकिन इन सबसे अलग मेरे अन्दर की एक अलग दुनिया है जहाँ बाहर का कोई दखल नहीं। बस मेरे लिए यही मेरी सीमा है। अपने काम और कैरीएर के प्रति बेहद गंभीर हूँ। लेकिन अगर काम अन्तरचेतना को प्रभावित करने लगे तो। अगर ना चाहते हुए भी आपका पाला अगंभीर, बिशुद्ध लम्पटों से पड़ जाए तो। क्या करेंगे आप। या तो समझौता करेंगे या कहीं और जगह तलाशेंगे या फ़िर लड़ पड़ेंगे। एक चौथा रास्ता भी है कि ख़ुद को इन सबसे किनारे कर कोई नया रास्ता बनायेंगे। भाई मैं कहता हूँ आप इनमे से कोई रास्ता अपनाईये लेकिन कृपा करके अन्दर ही अन्दर घुटिये मत। अशोक जी ने शायद यही किया। वरना ४२ साल की उमर कोई मरने की नहीं होती। हम जब ईटीवी में थे तो ईनाडु जर्नेलिज्म स्कूल में वर्कशॉप होती थी। जहाँ हमें तनाव को ख़ुद पर हावी ना होने देने की ट्रेनिंग दी जाती थी। बताया जाता था कि मीडिया में जो कुछ नहीं करता वो दूसरों को तनाव देता है। लेकिन आपके लिए आपकी जिंदगी से बढ़कर कुछ भी नहीं। ये नौकरी आख़िर तभी तक है जब तक आप हैं। और तभी तक आप अपने बीबी-बच्चों का पेट भी पाल पा रहे हैं। आप ख़त्म सब ख़त्म। मैयत के बाद कोई नहीं आता आपके बच्चे की फीस भरने। कोई नहीं पूछता कि आपके घर वाले किस हाल में हैं। मैंने सुना कि एनडीटीवी ने कभी अपने रिपोर्टर-कैमरामैन को हेलमेट दिया था। देश में जरूर कुछ ऐसे संगठन हैं जो अपने कर्मचारियों को इंसान समझते हैं। लेकिन ज्यादातर तो अपने रिपोर्टर-कैमरामैंन-एंकर-कॉपी एडिटर को कंडोम समझते। काम करते-करते या ख़ुद फट जाओगे या निकाल कर फैंक दिए जाओगे। जाहिर है आप कंडोम नहीं बनाना चाहते। तो फ़िर अपने अंतर्चेतना को जगाये रखिये, कोई उसे छेड़े तो उसे तुरंत छोड़िये। विकल्प ना हो तो भी फट जाने तक बर्दाश्त करने के बजाये, वक्त रहते दूसरी राह तलाशिये, वरना अशोक जी कोई अपवाद नहीं हैं। हममे से कोई भी उन जैसा हो सकता है।

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

होलिया चलो




अगले साल यानि २०१० की शुरुआत बेहतर ढंग से करने के लिए हम सब एक जनवरी को कुशीनगर और गोरखपुर की बिल्कुल सीमा पर स्थित होलिया गांव जा रहे हैं। वहां हमें श्रमदान करना है लेकिन उसका रूप क्या होगा ये वहीँ जाकर पता चलेगा। एन्सेफलाईटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कम्पेनर डॉ आर.एन.सिंह ने इससे ज्यादा ना तो कुछ बताया है और ना ही हमने पूछा है। मोबाइल पर बस इतनी ही बात हुई है कि चाहे धरती इधर से उधर हो जाए एक जनवरी २०१० को होलिया गांव पहुंचना है। डॉक्टर सिंह एक बार पहले भी हमें वहां ले जा चुके हैं। इस गांव में एन्सेफलाईटिस से कुछ बच्चों की मौत हो गई थी। होलिया पहुंचकर हमें पता चला था कि सरकार ने सन २००६ में जब पूरे पूर्वांचल में टीके लगवाने का दावा किया तब ना जाने क्यों इस गांव को छोड़ दिया। गांव के हालत देखकर साफ लगता है कि यहाँ कभी भी कोई भी बीमारी आसानी से पांव फैला सकती है। लेकिन अब डॉक्टर आर.एन.सिंह ने इस गांव को एन्सेफ्लाईटिस से मुक्त कराने का बीड़ा उठाया है। डॉक्टर सिंह यहाँ हर वो बात लागू करने वाले हैं जो वे पूरे देश में सरकार से लागू करवाना चाहते हैं। शुरुआत एक जनवरी से होगी। इस क्रम में होलिया के अलावा महाराजगंज का भी एक गांव डॉक्टर सिंह ने चुना है। आश्चर्य है.....पता नहीं किस बूते डॉक्टर सिंह दावा करते हैं कि अब इन गांवों में एन्सेफलाईटिस से एक भी बच्चा मरने नहीं पायेगा। जापानी एन्सेफलाईटिस के मच्छरों से बचाव के लिए डॉक्टर सिंह यहाँ फोग्गिंग करवाएंगे तो जलजनित एन्सेफलाईटिस से बचाव के लिए सूर्य की किरणों से पानी को शुद्ध करने की देशी तकनीक भी आजमाएंगे। गांव में एन्सेफलाईटिस मरीजों के लिए एक एम्बुलेंस भी होगी और जिन बच्चों की पहले मौत हो चुकी है उनके माँ -बाप को मुआवजा भी दिया जाएगा। लेकिन इन सबके के लिए धन कहाँ से आएगा। डॉक्टर सिंह इस सवाल का जबाब आध्यात्मिक अंदाज में देते हैं, "जिसका कोई नहीं उसका खुदा है यारों"। वैसे छपाक के सूत्रों से पता चला है कि डॉक्टर सिंह ने इस काम के लिए अपने परिवार की आमदनी का एक हिस्सा निकाला है और अपने शुभ चिंतकों को कुछ जिम्मेदारियां बांटी हैं। बहरहाल मुझ जैसे फक्कड़ से उन्होंने सिर्फ़ कुछ श्रमदान करने को कहा है जो हम जरूर करेंगे।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

बिकता है मीडिया खरीदने वाला चाहिए.....एक दिसंबर का मेल टुडे पढ़िए


(मेल टुडे से साभार)

When the press sells itself to politicos
By Pratul Sharma in New Delhi
Scanner on media for publishing articles in favour of poll- bound candidates in exchange of crores
THE Press Council of India ( PCI) has set up a panel to probe the allegation that some newspapers and television channels had sold editorial space to several candidates before the last Lok Sabha and recent Assembly elections.
This adds fodder to the fact that the distinction between news and advertisement is fast blurring and that propaganda of many politicians are indeed masquerading as news.
In other words, publicity material supplied by some political parties about their candidates was published without verification in newspapers in exchange of money. Though these candidates with deep pockets have been willing partners to the illegal act, other candidates have kept quiet, taking care not to offend prominent media houses.
A group of senior journalists have been demanding a thorough probe into the incidents and the required course correction for the media. After journalists such as the late Prabash Joshi, Kuldeep Nayar, George Verghese, Ajit Bhattacharjee and Harivansh wrote a letter to the PCI on this issue last June, a three- member committee to probe the allegations and suggest guidelines has been set up.
Nayar also submitted a separate representation to the Election Commission ( EC), requesting it to probe the matter.
The EC can take cognisance of such complaints under the Representation of the People Act as money spent for paid news is unaccounted for but should have been shown as valid poll expense.
The scathing letter states, “ News reports were financed with slush funds, accounts of which are with neither the candidates nor the newspapers. The editors and journalists were paid with black money as well.” Nayar wrote to the EC: “ During the last Lok Sabha elections, many in the print and electronic media charged for what they said in favour of a party or candidate.
At a seminar in Delhi the other day, human resource development minister Kapil Sibal contended that he knew how the stories were planted and paid for.
A top BJP leader has told me that he would give evidence if an inquiry committee was set up to look into the matter.” Though “ media packages” were sold to candidates and political parties as space is sold to advertisers, readers had no way of knowing the news stories they were reading were paid for or planted by the candidates.
“ The trend was by and large limited to vernacular and Hindi newspapers and channels in the states,” Nayar said, adding that mainstream English papers were left untouched by this trend.
News packages were sold for Rs 50,000 to Rs 1 lakh, according to details submitted to the PCI. The rate cards of Hindi dailies such as the Dainik Jagran , Dhanbad and Hindustan , Jamshedpur, and articles written by Joshi, the former Wall Street Journal ( WSJ ) bureau chief, who was investigating the trend was appended with the letter.
A WSJ report said as many as 10 people approached an Independent candidate in Chandigarh offering him to give him election coverage for three weeks in four newspapers for Rs 10 lakh. Needless to say, no receipt is given to the politicians in transactions of this kind. The report mentioned that the interested candidates were also asked to buy a few thousand copies of a particular newspaper at Rs 10 each copy.
Nayar said though the trend was present earlier also, it became blatant in the current Lok Sabha and the state elections.
“ I am told that crores were spent by political parties in Haryana for getting favourable election coverage,” Nayar added.
“ If campaign material is disguised as news reports, it violates the citizens’ right to knowledge. I have asked the EC to set up an inquiry committee to expose the people who were involved. Those who give evidence against the tainted must be protected,” the senior journalist said.
The letter submitted to the PCI sums up the Fourth Estate’s sorry state of affairs: “ This means there was no independent journalistic coverage during the polls। This signifies the end of journalism itself because nobody was working with an unbiased approach।”


PAPERS ACROSS INDIA MADE HAYWHILE POLL SUN SHINED
By Mail Today Bureaux
This year’s parliamentary polls and assembly elections, according to senior journalist Kuldeep Nayar, saw part of the media sold out to rich candidates. A close look at four states seems to confirm the shocking degradation of the Fourth Estate
UTTAR PRADESH
LALJI Tandon, the BJP MP from Lucknow, said BSP rival Akhilesh Das paid a Hindi newspaper to publish negative articles about him in the run- up to the last Lok Sabha polls.
“ I have spent four decades in politics but never felt comfortable to see such kind of private treaties. I am not against advertisements. But striking an unholy deal and booking editorial space is shameful. I would prefer to lose an election instead of playing this game”, Tandon said.
It’s another thing that the veteran BJP leader still won comfortably but he confesses to being no squeaky clean politician either. “ I have obliged this newspaper on many occasions. In fact, it has survived in Uttar Pradesh because of me,” Tandon candidly admitted at a press meet this April. “ But the kind of campaign it has started against me at the behest of Das is unprecedented.
I am not going to bow down before the newspaper at any cost.” About Rs 250 crore to Rs 300 crore allegedly exchanged hands unofficially in UP during the poll campaign when “ filthy rich candidates” individually bought space in newspapers for 15 to 30 days.
“ Newspapers not only entered an unholy alliance to lie in favour of one candidate and against another, but also earned crores in black money.
Editorial staff was deployed to write articles in favour of rich candidates who paid up,” Ashok Mishra, secretary of the UP unit of the CPI, said.
Rajya Sabha member and local businessman Das, who contested from Lucknow seat as a Bahujan Samaj Party ( BSP) candidate, had emerged as one of the most notorious players in this game, according to Tandon.
While criticising the top- ranking Hindi newspaper for its deal with Das, Tandon revealed that the management of the paper told him he could also enter into a deal with the paper. “ Pay and book equal space in our newspaper for yourself,” Tandon was told when he squared off with the management over the articles against him.
A Kanpur- based journalist took the story forward। “ Maybe Tandon doesn’t feel comfortable playing the game but his own party candidate from Kanpur, Satish Mahana, and the Congress’s Sri Prakash Jaiswal ( minister of state for coal) bought spaces in three Hindi and two English newspapers before this year’s polls,” he claimed.

Jhansi Congress candidate Pradeep Jain Aditya, as the journalist put it, “ dominated all other candidates in his constituency”. “ It paid dividend because he is the minister of state for rural development now,” said the journalist, who was “ forced to keep in touch with these politicians and write about them”. The trick that the newspapers and television channels play, according to him, is print and telecast negative news against many candidates to pressure them to enter a deal with the media. “ In most of the cases, the politicians succumb to the pressure,” the journalist added.



Ajay Kumar, a former senior reporter of a news channel who was posted in Lucknow, chuck his job just before the last Lok Sabha elections after his Delhi- based editorial chief asked him to demand money from all those candidates he was planning to interview.


BIHAR
‘ PAY up or lose out’ was the mantra in this year’s Lok Sabha elections in Bihar as well, claimed Dr Diwakar Tejaswi, one of those in the poll fray।
“ It is true that many newspapers in the state sold space to show a candidate in good light during the polls,” Tejaswi, a renowned medical practitioner, said.
He had contested the polls on a Bharat Uday Mission Party ticket from the Patna Sahib constituency.
“ All leading Hindi newspapers, except one, sought money from me for giving coverage to my campaign,” he said.
Tejaswi, who was pitted against the likes of the BJP’s Shatrughan Sinha and Congress nominee Shekhar Suman, said the “ coverage rates” were so steep that it was impossible for “ ordinary contestants like him” to afford them.
“ The rates were in the range of Rs 1 lakh to Rs 1.5 lakh for a fourday coverage,” he said.
Many vernacular dailies in the state blatantly offered space for “ exclusive” coverage of the candidates’ election campaign and the rates depended on the size of the story, Tejaswi said.
While some Hindi dailies offered the ‘ election package’ in the garb of an ‘ advertorial’ initiative of their marketing team, others simply put them in the form of news items with scant regard for journalistic ethics.
Calling the trend “ highly condemnable”, Tejaswi said such practices would “ enable the corrupt, the criminal and the rich to misuse the power of the press”. Another Lok Sabha candidate in the fray from the same constituency, Rashtriya Janata Dal’s Vijay Kumar Sahu, also admitted that some of the Hindi newspapers had demanded money from him in return of publishing his election coverage. “ I would not like to name any particular newspaper but it is true that I had to pay money to get some space in the newspapers,” he said.
Dubbing it as a dangerous trend that would undermine the power of journalism, he said it would deprive the poor and underprivileged candidates of genuine coverage of their campaign and would turn “ newspapers into the mouthpiece of the high and the mighty who would buy pages after pages for their exclusive coverage”. Sahu admitted to using “ the facility” during the polls but said he “ did not stand a chance for the rivals were far richer”.


PUNJAB
‘ CASH for news’ may have come to light only now but former MLA Hardev Arshi claims the trend was “ introduced” in Punjab and Haryana during the 2007 assembly elections itself.
Arshi, a member of the CPI’s national council, said during the 2007 polls, his party refused to pay for coverage in vernacular newspapers. But it was “ forced to give in” when newspapers refused to cover CPI events and political rallies.
“ Finally, we had to shell out about Rs 70,000 for advertisements and coverage in a constituency during the assembly elections in 2007,” Arshi said.
“ The Press Council of India or some statutory authority should look into the matter,” he added.
A politician said money to the media organisations — many of them owned by individual business houses — was paid in cash.
In fact, in many cases, the management also issued instructions to reporters to favour particular candidates. Usually, the stories of such candidates were published in the newspaper’s “ reserved space”, he added.
As another politician put it: “ Newspapers took money in advance for publishing positive stories about the candidates.
Those who refused to pay were completely blacked out.” Sources said the majority of media organisations — especially the regional press — had become commercialised, but added that the English press was largely immune to the trend.
Revealing the modus operandi, a journalist in Bathinda, Punjab, said his newspaper reserved space for “ paid” editorial pieces and charged in cash. This meant the parties or the candidates got rid of the need of issuing advertisement release orders or obtaining bills against them.


GUJARAT
IN GUJARAT, no one dares to go on record over the issue of ‘ paid news’. It remains an unacknowledged fact, however, that editorial space in newspapers is indeed sold to political parties for election coverage.
An experienced campaign manager from the BJP said, “ The common practice is that parties are charged at the rate of centimetre per column for such pieces.” A top Congress leader said local vernacular dailies charge political parties at the prevailing advertising rates. They even develop “ special packages” for parties depending on the market situation.
Another veteran politician said, “ Payments are mostly made directly to the owners of the newspapers.”
By Piyush Srivastava in Lucknow, Vikas Kahol in Chandigarh, Giridhar Jha in Patna and D। P. Bhattacharya in Ahmedabad


The cash- for- news concept is not new
By Mail Today Bureau in New Delhi
THE “ PAID news” debate sparked by an extensive “ cash- for- election- coverage” expose concerning Maharashtra chief minister Ashok Chavan is not new.
The first officially blessed manifestation of this idea was called Medianet, an initiative by Bennett, Coleman and Company Ltd ( BCCL), the publishers of The Times of India . Aimed at stopping journalists from taking money to get stories published, the BCCL management decided to charge fashion designers, corporates, socialites and NGOs to be featured in some of its supplements such as Bombay Times and Delhi Times . Medianet, now called Optimal Media Solutions, even had a rate card for specific displays.
In 2008, The TOI initiated what is called Private Treaties, a division that picks up equity in companies in exchange for advertising inventory. It was alleged ( though never proven) that because of Private Treaties, the ventures could also escape unfavourable coverage in the TOI and its sister publications.
The model was so successful that other media houses such as Hindustan Times , NDTV , Dainik Bhaskar , Network18 , and Dainik Jagran also adopted it.
A former Medianet employee, who now works for a large corporate, says: “ All payments for Medianet were above board. At least in the initial phase, a Medianet story had a legend against it so that the reader could differentiate it from other stories. It was later discontinued after the advertisers complained that they wanted the photo or report to look like a genuine news story.” The former BCCL employee also says The TOI was perhaps the only paper which had a legitimate, above- board division to look into this. “ There are several newspapers, especially in the Hindi and regional language press, which take money on the sly for favourable coverage. One of the largestselling newspapers in Gujarat, for instance, routinely gives favourable coverage to politicians and companies for a price.” An industry observer says the success of Private Treaties inspired HT to start its own “ Partnership for Growth” division.
HT did not buy equity in the companies; instead it offered them barters for unsold advertising inventory.
“ There have been instances when newspapers and television channels, which have adopted this model, have compromised editorial space and airtime in favour of their partners,” he says. “ This happens routinely in the vernacular newspapers in which the proprietors are often in collusion with politicians who have a cap on their campaign spend.” The ex- Medianet employee says the paid news model also works. “ A second- level Indian software company bought editorial space in a leading British newspaper and in a US newspaper. Top corporates usually avoid it in India, but PR executives pitch for favourable coverage for their clients by bribing journalists and proprietors in cash or kind.”

‘ CHAVAN PAID THE PRESS & WON’
PTI
ACCUSING Maharashtra chief minister Ashok Chavan of indulging in electoral malpractice, the BJP on Monday asked the Election Commission ( EC) to order a probe into the issue.
They demanded Chavan’s election be declared as invalid.
BJP vice- president Mukhtar Abbas Naqvi, who led a delegation to chief election commissioner Navin Chawla, alleged that Chavan had violated the Representation of the People Act by furnishing false information to the EC. He alleged that Chavan had spent crores to get full- page coverage in several newspapers but showed a little over Rs 5,000 on print advertisement according to records submitted to the EC. Naqvi said the EC assured the delegation that it will look into the matter.
BJP’s Prakash Javadekar said the full- page advertisements came in the form of news items, praising Chavan.

हरमिंदर! ये आपने क्या किया?

३१ साल नौकरी करने के बाद वरिष्ठ आई.ए.एस अधिकारी हरमिंदर राज सिंह ने आत्महत्या कर ली। अब आईएएस एसोसिएशन ने उत्तर प्रदेश में आई.ए.एस अधिकारियों पर जरुरत से ज्यादा दबाव कर मुद्दा उठाया है। एसोसिएशन के अध्यछ संजयभूसी रेड्डी खुलकर मीडिया के सामने अपने दिल का दर्द बयां करते हैं। माहौल ग़मगीन है लेकिन सवाल उठाना जरूरी है कि क्या वाकई हरमिंदर राज सिंह पर कोई ऐसा दबाव था जिसके चलते उन्होंने आत्महत्या कर ली। कम ही उम्मीद है कि इस मामले में सही जांच होगी और सच्चाई सामने आएगी। लेकिन इससे भी बढ़कर आज की तारीख में आई.ए.एस एसोसिएशन को इस सवाल का जबाब देना चाहिए कि दबाव चाहे जैसा भी हो क्या किसी आई.ए.एस को आत्महत्या जैसा कदम उठाने पर मजबूर कर सकता है। संजय भूसी रेड्डी की गिनती ख़ुद ईमानदार अधिकारियों में होती है। ये भी सब जानते हैं कि संजय भूसी ज्यादातर समय ऐसे पदों पर रहे जहाँ कोई आई.ए.एस जाना नहीं चाहता। हरमिंदर राज सिंह ने अपनी पूरी नौकरी अच्छे पदों पर गुजारी थी। आत्महत्या के वक्त भी वे प्रमुख सचिव आवास के पद पर थे जिसे बेहतर पद माना जाता है। संजय भूसी रेड्डी बेहतर जानते होंगे कि आई.ए.एस बनने के बाद किसी भी अधिकारी के सामने जिंदगी के बेशुमार रास्ते खुल जाते हैं। आई.ए.एस किसी भी रास्ते पर चले कठिनाइयाँ उसके ब्यक्तिगत जीवन पर ज्यादा असर नहीं डाल सकतीं। यहाँ तक कि लाख चाहकर भी ख़ुद मुख्यमंत्री किसी आई.ए.एस की नौकरी नहीं ले सकता। अधिक से अधिक आई.ए.एस को निलंबित कर सकता है। आई.ए.एस की नौकरी सिर्फ़ राष्ट्रपति की दस्तखत से ही जा सकती है। आई.ए.एस चाहे जिस पद पर रहे, गाड़ी-बंगला-नौकर-चाकर उसे मिलेंगे ही। फ़िर हरमिंदर राज सिंह तो अपनी नौकरी का बड़ा हिस्सा बेहतरीन पदों पर गुजार चुके थे। उन्हें आख़िर किस तरह का दबाव हो सकता है जो उन्हें आत्महत्या पर मजबूर कर दे। बेटा अच्छे पद पर। बेटी शादीशुदा। और पत्नी दिल्ली में अच्छी नौकरी करती हुईं। क्या कमी थी हरमिंदर की जिंदगी में।
लखनऊ में तरह-तरह की बातें हवा में तैर रही हैं। जितने मुंह-उतनी बातें। कोई कहता है क़ि मायावती राज में ईमानदार अधिकारियों की कोई जगह नहीं। हरमिंदर कोर्ट में उन विवादस्पद निर्माण कार्यों की पैरवी करते थे जिनके लिए लगातार मायावती सरकार की किरकिरी हो रही है। लोग कहते हैं कि हो सकता है कि ऐसे ही किसी दबाव को नहीं झेल पाने के चलते हरमिंदर ने अपनी जान ले ली हो।
भाई! क्या हरमिंदरराज सिंह कोई सड़क के आदमी थे कि इतनी मामूली बातो से परेशान होकर उन्होंने आत्महत्या कर ली। आई.ए.एस होने के नाते मसूरी की अकादमी में उन्हें बाकायदा एक साल तक ऐसे ही दबावों से लड़ने की ट्रेंनिंग दी गई होगी। फ़िर फील्ड में भी लंबे अरसे तक उन्हें सिखाया गया होगा। अगर वाकई उन्होंने दबाव में आकर आत्महत्या की तो दरअसल वे बिल्कुल भी सहानभूति के पात्र नहीं हैं। अगर वाकई उनपर दबाव था तो उन्हें सच्चाई के साथ जनता के बीच जाना चाहिए था। वे लड़ सकते थे या फ़िर ख़ुद को अलग-थलग करके शान्ति का जीवन गुजार सकते थे। आत्महत्या करने की नौबत तो कत्तई नहीं थी। अगर एक आई.ऐ.एस आत्महत्या करेगा तो फ़िर इस प्रदेश का किसान, मजदूर और बेरोजगार क्या करेगा। इसीलिए कम से कम हरमिंदर सिंह की मौत के बाद लोक सेवा आयोग को आई.ऐ.एस की परीछा और ट्रेनिंग पर पुनर्विचार जरूर करना चाहिए। अगर न दी जाती हो तो आई.ऐ.एस को नौकरी करने के अलावा बेईमानी से लड़ने और दबावों के सामने नहीं झुकने की भी ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। वरना हरमिंदर सिंह की तरह कमजोर अधिकारी पहले दबेंगे फ़िर डरकर ख़ुद को मौत के हवाले कर देंगे। ये स्थिति देश की प्रशासनिक सेवाओं में जाने वाले हर बन्दे के लिए शर्मनाक है।

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

बकवासम रिपोर्ट!

लिब्रहान आयोग की जिस रिपोर्ट पर पिछले दो दिन से संसद और मीडिया का बेशकीमती समय लुटाया जा रहा है असल में उसका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला। वैसे भी तीन महीने के बजाये १७ साल में सरकार का काफी रुपया बहाकर तैयार की गई इस रिपोर्ट में वही सब है जो देश के बच्चे-बच्चे को पहले से मालूम है। हाँ...रिपोर्ट में कुछ ऐसी बातें (मसलन पी.वी.नरसिम्हा राव की सरकार को क्लीनचिट और अटल बिहारी बाजपेई का नाम ) भी हैं जो इसकी गंभीरता को और कम कर देती हैं। अच्छा होता कि अगर इंडियन एक्सप्रेस ने इस रिपोर्ट को लीक नहीं किया होता तो संसद में पछ-विपछ को इसपर टाइमपास करने का मौका न मिलता। बेवजह जनता के धन का इतना 'और' दुरूपयोग न होता। अच्छा एक बात बताइए दिल से.....क्या आपको लगता है की इस रिपोर्ट में दोषी ठहराए गए एक भी नेता या अधिकारी के खिलाफ इस जनम में कोई कार्यवाही होगी? अगर अटल बिहारी बाजपेई ख़ुद आज कल्याण सिंह की तरह ताल ठोंकते हुए कबूल कर लें कि वे दोषी हैं तो भारत की कौन सी जेल उनको इस मुकाम पर अपना कैदी बना पायेगी। क्या कल्याण सिंह, बाल ठाकरे, अशोक सिंघल या उमा भारती जैसों को पकड़कर कोई सरकार भारतीय दंड संहिता की सम्बंधित धाराएँ कभी तामील करा पायेगी। क्या पीवी नरसिम्हा राव की आत्मा ये बताने आयगी कि उनकी इस मामले में क्या भूमिका थी। कोई आख़िर क्या करेगा इस रिपोर्ट का। आख़िर किसे बेवकूफ बना रहे हैं ये नेता। टीवी चेनलों पर एंकरों के चिल्लाने से क्या देश का उद्धार हो जाएगा। क्या फर्क पड़ेगा। क्या मस्जिद वापस आ जायगी या फ़िर देश का संप्रदायिक सदभाव कुछ बढ़ जाएगा। क्या.... होगा क्या ? इस बेमतलब की बहस से। संसद में रिपोर्ट पेश हुई तो सुरेन्द्र अहलूवालिया ने जयश्रीराम का उद्दघोष किया। अमर सिंह 'या अली' बोलते हुए उन्हें मारने को दौड़े। फ़िर दोनों ने बताया कि वे तो कलकत्ता में एक साथ बिताये कॉलेज के दिनों की याद ताज़ी कर रहे थे। हम-आप फिजूल में ही दांतों तले उंगली दबाये ये सारा नाटक देखते रहे। बस हो गया घर पर केबल लगवाने का पैसा वसूल।
बकवास, बकवास और महज बकवास है ये सब। आम आदमी के जीवन की तकलीफ़ो में इससे कोई कमी नहीं आने वाली। फ़िर भी पता नहीं कैसे हैं हम? जो अपने प्रतिनिधियों को एक बार संसद में भेजकर भूल ही जाते हैं। रोज़ शाम थैला लेकर बाजार पहुँचते ही आसमान छूती महंगाई कमर कमजोर कर देती है लेकिन याद नहीं आता कि हमारे प्रतिनिधियों को इस मुद्दे पर संसद में सरकार का जीना हराम कर देना चाहिए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान इस मामले में फ़िर भी जागरूक हैं। संसद सत्र शुरू होने के पहले ही दिन अपने नेता अजित सिंह, मुलायम सिंह और इलाके के सारे सांसदों को मजबूर कर दिया संसद में हंगामा मचाने को। दिल्ली की सडकों पर किसानो ने कमान ख़ुद संभाली। दो दिन संसद ठप्प रही और तीसरे दिन सरकार ने उनकी मांग मान ली। लोकतंत्र में दरअसल ऐसे निकला जाता है अपनी समस्याओं का हल। गन्ना किसान पिछले कई महीनो से लड़ रहे थे। उनके नेताओं को मालूम है कि उनकी वाली नहीं हुई तो इलाके में मुंह दिखाना मुश्किल हो जाएगा।
लेकिन महंगाई सहित कई समस्याओं से परेशान आम आदमी की तो कोई जमात है ही नहीं ना। बस अपने-अपने घरों में बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ बढती महंगाई पर आंसू बहा सकते हैं। १०१ रुपए किलो अरहर की दाल, ३० रूपया किलो प्याज और ३० रुपये किलो मसूरी चावल हो गया । हर चीज के दाम आसमान छू रहे हैं। निम्न मध्य वेर्गीय और गरीब आदमी की खुराक कम हो गई है। मंदी के नाम पर देश भर में लाखों नये बेरोजगार पैदा हो गये हैं जिन्हें मंदी ख़त्म होने के बाद भी नौकरी नहीं मिली है। कहाँ जायेंगे ये सब और इनके बाल-बच्चे । किसी को परवाह है! संसद में लिब्रहम रिपोर्ट पेश होते ही लखनऊ में बेशर्म कल्याण सिंह कुरता झाड़कर कैमरों के सामने खड़े हो गये। लगे चिंघाड़ने, '' मुझे मस्जिद गिरने का कोई अफ़सोस नहीं।" याद कीजिये कुछ महीने पहले ही मुलायम से दोस्ती करके यही कल्याण मस्जिद मामले में सफाई देते घूम रहे थे। अभी ना घर के हैं ना घाट के। सो बीजेपी की तरफ़ आशा भरा एक पैगाम पहुँचाने का इतना बेहतर मौका भला क्यों गंवाते ।

ये रिपोर्ट इंडियन एक्सप्रेस में लीक कैसे हुई इसको भी मुद्दा बनाया गया। गृहमंत्री पी.चिदम्बरम कहते हैं उनके मंत्रालय ने ये काम नहीं किया। जस्टिस लिब्रहान कहते हैं कि वे इतना नीच काम कर ही नहीं सकते। अरे छोड़ दीजिये साहब! पता नहीं ये काम नीच है या उंच। और हम अगर जान भी जायें कि किन महाशय ने ये कारनामा कर दिखाया तो भला क्या कर लेंगे और सबसे बढ़कर कि आख़िर हम कुछ क्यों करें। रिपोर्ट अखबार में छपे या संसद में रखी जाए हमारी बला से। क्या फर्क पड़ने वाला है। ये नेता और मीडियावाले आख़िर फालतू बातों पर इतना क्यों चिल्लाते हैं। कहीं इसके पीछे भी कोई सोची-समझी चाल तो नहीं। ठीक समझा आपने....ये सब मिलकर जनता की मौलिक समस्याओं को दबाने की चाल चल रहे हैं.यकीन मानिये इनकी चली तो संसद में एक दिन भी जनता से जुड़े सार्थक मुद्दों पर कोई बात नहीं होगी। लोकसभा टीवी के बायोस्कोप पर हमे कभी चीन की रार, कभी पाकिस्तान को ललकार, कभी सिख दंगों की रिपोर्ट, कभी गुजरात दंगों की तो कभी अयोध्या ध्वंश की रिपोर्ट्स देखने को मिलेंगी। कभी प्रधानमंत्री मनमोहन , राष्ट्रपति ओबामा के मेहमान बनकर दबी जुबान चीन की शिकायत से हमे खुश करेंगे तो कभी राहुल सिर पर गारे-माटी की कराही उठाकर जता देंगे कि भावी प्रधानमंत्री बनने के लिए वे किस हद तक मेहनत कर सकते हैं। लेकिन उनमें से कोई लाख नाटक करे, कुछ भी कहे, देश के आम आदमी के लिए असल में कुछ नहीं करने वाला। दरअसल, आम आदमी उनका एजंडा ही नहीं है।


डाक्टर आर.एन.सिंह की कलम से..........

ोजपुरी में बड़ी पुरानी कहावत है 'जाके पैर ना फटे बवाई ते का जाने पीर पराई '। मुख्यमंत्री मायावती बुंदेलखंड और हरित प्रदेश के साथ भोजपुरी भाषी इलाके को अलग कर पूर्वांचल बनाने का समर्थन तो करती हैं लेकिन भोजपुरी की इस पुरानी कहावत का मर्म नहीं समझतीं। शायद इसीलिए उन्होंने पूर्वांचल में पिछले ३१ सालों के दौरान ५० हज़ार से ज्यादा मौतों का सबब बनी बीमारी एन्सेफ्लाईटिस पर शोध के लिए यहाँ नहीं बल्कि लखनऊ के सुपर हॉस्पिटल संजय गाँधी स्नातकोत्तर आर्युविज्ञानं संस्थान में जगह चुनी है। सब जानते हैं की एन्सेफ्लाईटिस के पंचानबे से सनतानबे प्रतिशत मरीज़ गोरखपुर और उससे लगे छः जिलों से आते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के बेलगाम बाबुओं को ये भला कौन समझाएगा? जरा सोचिए कि सेण्टर ऑफ़ एक्सीलेंस फॉर जेई के लिए गोरखपुर के बजाये पीजीआई को चुनने के पीछे राज्य सरकार की क्या मंशा रही होगी। मैं कम से कम सौ वजहें गिना सकता हूँ जिनके चलते इस सेण्टर को पीजीआई में नहीं गोरखपुर में होना चाहिए। पहली वजह तो ये है की गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में इस बीमारी के कम से कम सौ-डेढ़ सौ मरीज़ हर वक्त भर्ती रहते हैं। जबकि पीजीआई में इक्का-दुक्का मरीज़ ही आते हैं। पीजीआई में जब मरीज़ ही नहीं हैं तो वायरस पर दवाओं का असर कैसे जांचा जा सकता है। ये काम गोरखपुर में आसानी से सम्भव है। एन्सेफलाईटिस के वायरस में कोई खास जेनेटिकम्यूटेशन की पड़ताल करने के लिए भी पीजीआई को गोरखपुर और आस-पास से ही सेम्पल मांगना पड़ेगा । नतीजतन हालत वैसे ही रहेंगे जैसे पिछले चार साल से हैं। चार साल से ये सेम्पल एन.आई.वी पूना भेजे जाते थे। वहां से महीनो बाद जब तक रिपोर्ट आती थी तब तक मरीज़ का जो भी होना हो, हो चुका होता था। २७ सितम्बर २००६ को इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने भी गोरखपुर में अन्तररास्ट्रीय स्तर का शोध केन्द्र बनाए जाने का निर्देश दिया था। इसके अलावा, समय-परिस्थिति और लोगों का रहन-सहन , शोध के लिए सभी चीजों पर ध्यान देना होता है। सीधी सी बात है जहाँ बीमारी होगी शोध तो वहीँ हो पायेगा। जो शोध गोरखपुर में हो सकता है वो लखनऊ में हो ही नहीं सकता। चलिए सब कुछ छोड़ दीजिये, यदि लोकतंत्र में न्यायपालिका सर्वोपरि है तो भी माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद के आदेश (२७ सितम्बर,२००६) की मंशा को सही रूप में लें तब भी सेण्टर गोरखपुर में ही होना चाहिए।


क्या होगा सेण्टर गोरखपुर में बन जाने से:


सुना करते थे कि लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं । यहाँ तो हालात और खराब हैं। लड़ने को लड़ भी रहे हैं और दुश्मन की पहचान ही नहीं हो पाई । फ़िर कैसे होगी फतह। सरकारी बयानों को सच माने तो पहले जेई फ़िर वीई और अब ऐईएस हो गई बीमारी। भले ही परमाडू करार से लेकर चाँद पर घर बनाने में हम सफल हो गये हैं किंतु ३१ साल की इस बीमारी के सही कारक को चिन्हित करने में आज की तारीख तक हम पूरी तरह से नाकाम हैं। इसीलिए उच्च न्यायलय के आदेशानुसार अंतररास्ट्रीय स्तर का एक शोध केन्द्र तत्काल गोरखपुर में बनाया जाना चाहिए। जिससे सही कारक वायरस की पहचान हो सके और जंग-ऐ-एन्सेफलाईटिस को एक अंजाम दिया जा सके। ऐसे तो हम मौतें ही गिनते रह जायेंगे।


गोरखपुर में सेण्टर ऑफ़ एक्सेलेंस फॉर जेई बनाये जाने की मांग को लेकर सांसदों से आवेदन किया जा रहा है कि वे इस मुद्दे को सदन में उठायें और अविलम्ब सेण्टर को गोरखपुर में स्थानांतरित कराएँ। जिन सांसदों को यह आवेदन किया जा रहा है उनमे योगी आदित्यनाथ, आर.पी.एन सिंह, जगदंबिका पाल, हर्षवेर्धन सिंह, कमल शामिल हैं। साथ ही जिन लोगों ने पूर्व में एन्सेफलाईटिस के प्रति संवेदना दिखाई है उनसे भी आवेदन किया जा रहा है जैसे राहुल गाँधी और राजबब्बर। २००६-२००८ में इन लोगों ने काफी संवेदना दिखाई थी।


एक बात और ! एन्सेफलाईटिस से मौतों का सिलसिला लगातार जारी है। अकेले गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में साल २००५ में इस बीमारी के ४७५२ मरीज़ आए जिनमे से ११३५ की मौत हो गई। २००६ में २०२९ आए ४३७ मर गये। २००७ में २७२९ आए ५४७ मर गये। २००८ में दो हज़ार आए ४५० मर गये। इस साल जनवरी से अब तक २५०९ मरीज़ आए जिनमे से ४८४ की मौत हो चुकी है। मरीजों का आना और मर जाना लगातार जारी है। कोई है जो इन्हें बचाएगा ?


(लेखक एन्सेफ्लाईटिस उन्मूलन अभियान के चीफ काम्पेनर और प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ हैं )



सोमवार, 23 नवंबर 2009

एक शाम मासूमों के नाम

32 साल से पूर्वांचल के मासूमों पर मौत बनकर बरस रही बीमारी एन्सेफ्लाईटिस के खिलाफ मुहिम अब कामयाब होने लगी है। सरकार ने जापानीज एन्सेफ्लाईटिस के टीके की दूसरी खुराक लगाने के कार्यक्रम को मंजूरी दे दी है। पिछले दिनों इस कार्यक्रम की घोषणा गोरखपुर के सीएम्ओ ने की। गौरतलब है कि पिछले कई सालों से एन्सेफ्लाईटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कम्पेनेर डाक्टर आर.एन.सिंह टीके की दूसरी खुराक लगवाने की मांग कर रहे थे। डाक्टर सिंह के मुताबिक टीके की कम से कम दो खुराक ही कारगर होती है। ख़ुद टीका बनानने वाली कम्पनी ने भी टीके के रेपर पर इसकी कम से कम तीन खुराक लगवाने की ताकीद कर रखी है। लेकिन ना जाने क्यों सरकार इस टीके की एक खुराक को ही पर्याप्त मानकर चल रही थी। सरकार की इस अनदेखी के चलते पूर्वांचल में ऐसे बच्चे भी एन्सेफ्लाईटिस के शिकार होते रहे जिन्हें टीका लगाया जा चुका था। डाक्टर आर.एन.सिंह कहते हैं कि सरकार ने टीके की दो खुराक भी दिलवा दी होती तो इस तरह आधे-अधूरे नतीजे नहीं आते।
इस बीच बाल दिवस की पूर्व संध्या पर गोरखपुर में सूरजकुंड सरोवर सेकड़ों लोगों ने एन्सेफ्लाईटिस से इस साल गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में मरे बच्चों की याद में दीप जले। लोगों ने दीप से नीप (नेशनल एन्सेफ्लाईटिस एरेदिकेशन प्रोग्राम) लिखकर इसे लागू करने की मांग की। इस कार्यक्रम की अगुवाई एन्सेफ्लाईटिस उन्मूलन अभियान की संयोजक डाक्टर वीणा और श्रीमती स्नेह ने की। कार्यक्रम में संरछ्क के तौर पर मौजूद डाक्टर आर.एन.सिंह ने कहा कि इन दीपों की टिमटिमाती 'लो' ठीक उसी तरह है जैसे एन्सेफ्लाईटिस से बीमार बिस्तर पर पड़े किसी मासूम की सांसें जिंदगी और मौत के बीच अटकीं होती हैं। हमें इस 'लो' के बुझने से पहले सरकार को नीप लागू करने के लिए हर हाल में मजबूर करने की शपथ लेनी है ताकि मासूमों का जीवन टूटती सांसों का मोहताज़ न रहे।
छपाक संवाददाता, गोरखपुर, १३ नवम्बर २००९

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

अकेली ना रिपोर्टिंग पर जाया करो

दिल्ली में ट्रेड फेअर की रिपोर्टिंग करने गई एनडीटीवी की रिपोर्टर अंजली को किसी मनचले ने छेड़ दिया। अब मनचला तो मनचला ठहरा उसे क्या पता कि अनजाने में वो जिससे टकरा रहा है वो कोई मामूली लड़की नहीं देश के प्रमुख टीवी चैनल की रिपोर्टर है। फ़िर क्या था इस मामले में जो होना था वही हुआ। अंजली ने मनचले का गिरेबान पकड़ा और जमकर दिए हाथ दो हाथ। अंजली ट्रेड फेअर में जाते वक्त सोच रही थी कि खबर क्या बनेगी। मनचले ने ख़ुद शामत मोल लेकर अंजली को एक ख़बर भी मुहैया करा दी। इस घटना के आधार पर एनडीटीवी ने सवाल उठाया कि ट्रेड फेअर और दिल्ली में लड़कियों की सुरछा के इंतजाम क्या हैं। ये ख़बर निश्चित रूप से उस नॉर्मल खबर से ज्यादा देखी गयी जो अंजली ट्रेड फेअर पर बनातीं। लेकिन इस हादसे के बाद एनडीटीवी में कुछ लोगों ने अंजली को सलाह भी दी है कि आगे से वो अकेली ना रिपोर्टिंग पर जाया करें।
छपाक रिपोर्टर, नई दिल्ली

ठाकरे कौन?

शुक्रवार को मुंबई में आईबीएन-लोकमत के दफ्तर पर हमले के तुरंत बाद महारास्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चाह्वाद ने सख्त कार्यवाही का आश्वासन दिया तो लगा लंबे अरसे से पुंसकों जैसा ब्यवहार कर रही महारास्ट्र सरकार की गैरत जाग गयी है। लेकिन थोड़ी ही देर में जाँच के लिए कमेटी बनाने की बात कहकर मुख्यमंत्री ने बता दिया की उनके पैजामे के नीचे कुछ नहीं है। बहरहाल काबिले तारीफ हैं लोकमत के वे पत्रकार जिन्होंने ठाकरे के सात गुंडों को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। देखें कि सामना के संपादक संजय राउत सिर्फ़ अपने दफ्तर में बैठकर ठाकरे के शत्रुओं को सबक सिखाने का बयान देते रहते हैं या फ़िर अपने पालतुओं की जमानत कराने थाने तक भी पहुँचते हैं। आईबीएन ७ - लोकमत को इस हमले से कोई नुकसान होने के बजाय फायदा ही हुआ है। मंदबुद्धि ठाकरे को भला क्या पता कि ऐसे हमलों से अब झोपड़पट्टी वाले भी नहीं घबराते। मीडिया वालों को तो उलटे फायदा ही होता है। इस हफ्ते की टैम रिपोर्ट आने दीजिये। पता चल जायगा कि शुक्रवार की शाम आईबीएन-लोकमत की टीआरपी कितनी बढ़ी।
कुछ दिन पहले ही राज ठाकरे के विधायकों ने विधानसभा में अबू आजमी से हाथापाई की थी। आजमी को भी इससे फायदा ही हुआ था। लेकिन सवाल उठता है कि महारास्ट्र की राजनीती में कभी गंभीरता से नहीं लिए गये चाचा-भतीजा अचानक पागल क्यों हो गये हैं। 'मातुश्री' नाम के एक मकान में जिन्द्गगी के आखिरी पड़ाव पर आराम से दिन गुजार रहे बाल ठाकरे को रिटायरमेंट के बाद फ़िर से काम पर लौटना पड़ा है। जाहिर है बाल ठाकरे को समझ आ गया है कि शिवसेना की दुकान बेटे उद्धव ठाकरे को सौंपना, उनकी गलती थी। नालायक उद्धव ने दुकान को बंदी के कगार पर पहुँचा दिया है। शिवसेना जैसी पुरानी दुकान से अच्छी तो राज ठाकरे की नई दुकान एम्एनएस चल पड़ी है। बेचारे बाल ठाकरे को बुढौती में दुकान पर बैठना पड़ रहा है। बहुत छोटी उमर से कम-धंधे में लग गये बाल ठाकरे को शायद पढ़ने का ज्यादा मौका नहीं मिला। उनका हिन्दी ज्ञान तो बिल्कुल ही सीमित है। इसीलिए हिन्दी की एक पुरानी कहावत 'पूत कपूत तो का धन संचय.........' उन्होंने नहीं। अन्यथा उद्धव के लिए अपना बुढ़ापा यों ख़राब नहीं करते।
कोई भी बता सकता है मराठी मानुस के नाम पर चल रही इस बकवास राजनीती में 'कुत्ता' प्रेमी राज ठाकरे (विधानसभा में अबू आजमी पर हमले वाले दिन राज ठाकरे की गोद में एक कुत्ता इठलाते देखा गया था) अपने चाचा बाल ठाकरे से काफी आगे निकल गये हैं। शुक्रवार को लोकमत के दफ्तर पर शिवसेना का ये हमला दरअसल 'बड़ा ठाकरे' कौन है यही साबित करने के लिए हुआ है। हाल में संपन्न हुए महारास्ट्र विधानसभा के चुनाव में करारी हार के बाद से ही बाल ठाकरे, राज ठाकरे को पछाड़ने लिए मचल रहे थे। दो दि पहले ही बाल ठाकरे ने सचिन तेंदुलकर को मराठी से पहले ख़ुद को हिन्दुस्तानी कहने पर 'चाहेंट' लिया था। बाल ठाकरे ने जिस बात के लिए सचिन तेंदुलकर की निंदा की वो या तो जिन्ना मानसिकता का कोई ब्यक्ति ही कर सकता है या फ़िर कोई पागल।
ठाकरे के मुंह से निकलती ऐसी बकवास और उनके पालतुओं की ऐसी हरकत से साफ है महारास्ट्र की राजनीती में ठाकरे की कोई ओकात नहीं बची है। वोटर इनको पूछ नहीं रहा। चुनाव ये जीत नहीं पा रहे। अब ये तो सिर्फ़ सरकार की नपुंसकता है जो ये कभी सडकों पर ठेले-खोमचे-ऑटो वालों पर ताकत आजमाते हैं, कभी अमिताभ बच्चन के घर के सामने बोतलें फेंकते हैं, कभी रेलवे भर्ती परीछा में गये बच्चों को पीटते हैं, कभी विधानसभा में अबू आजमी से लड़ते हैं तो कभी लोकमत के दफ्तर पर हमला करते हैं।
ये भी साफ है कि ठाकरे पर लगाम कसने के लिए जनता और मीडिया द्वारा सरकार को दी जा रही 'शक्ति जागरण' ओसधियों का कोई असर क्यों नहीं पड़ रहा है। दरअसल सरकार और कांग्रेस को फिलहाल शिखंडी बने रहने में ही फायदा नज़र आ रहा है। 'जिन्हें' रोजगार के लिए सरकार के बाल नोचने चाहिए, बाल और राज ठाकरे ने उन्हें रोजगार दे रखा है। साथ ही मीडिया का पूरा ध्यान बेमतलब चाचा-भतीजा पर लगा है। सरकार को उसकी नाकामियों और जनता के असल सवालों पर घेरने वाला कोई है ही नहीं।

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

चाचा नेहरू सा दिल चाहिए

गोरखपुर में इस बार चाचा नेहरू का जन्मदिन एन्सेफ्लाईटिस से मारे गये बच्चों को श्रधान्जली दिवस के रूप में मनाया जाएगा। यहाँ मरे की जगह 'मारे गये' शब्द का उल्लेख सोच समझ कर इसलिए किया है क्योंकि इन बच्चों को बचाया जा सकता था। जैसा कि हम सब जानते हैं कि चाचा नेहरू को बच्चों से बहुत प्यार था। केवल भारत के नहीं दुनिया भर के बच्चे उनके चहेते थे। आजादी के दो साल बाद टोकियो शहर के बच्चों ने चाचा नेहरू को चिठियाँ लिखकर भारतीय हाथी देखने की इच्छा जाहिर की। सितम्बर १९४९ में नेहरू जी ने उन्हें तोहफे के रूप में एक हाथी भेज दिया। उस हाथी का नाम 'इंदिरा' रखा गया था. २४ सितम्बर १९४९ को जब ये हाथी टोकियो के चिडियाघर पहुँची तो उसके स्वागत के लिए हजारों बच्चे मौजूद थे। बच्चों की खुशी देखते ही बनती थी। हाथी भेजने के बाद ३ दिसम्बर १९४९ को पंडित नेहरू ने जापानी बच्चों के नाम एक पत्र लिखा। उस पत्र में उन्होंने जापान के बच्चों को भारत और दुनिया के बारे में वैसे ही बातें बताईं जैसी वे अक्सर अपनी प्यारी बेटी इंदिरा को बताया करते थे। जाहिर है पंडित नेहरू का दिल इतना बड़ा था कि उसमें दुनिया भर के बच्चे समां सकते थे। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के नेहरू चिकित्सालय में लगी नेहरू जी की तस्वीर देखकर जाने क्यों ख्याल आता है कि काश! नेहरू जी होते तो यहाँ इन मासूमों को जान ना गंवानी पड़ती। १४ नवम्बर को नेहरू जी का जन्मदिन पूरे देश में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस बार गोरखपुर में इसे बच्चे बचाव दिवस के रूप में मनाया जाएगा। एन्सेफ्लाईटिस उन्मूलन अभियान की समन्वयक डॉक्टर वीणा सिंह ने बताया कि बाल दिवस की पूर्व संध्या पर पवित्र सूरजकुंड सरोवर में इस साल एन्सेफ्लाईटिस से मरे हर बच्चे की याद में एक दीया जलाया जाएगा। चीफ कम्पेनर आर.एन.सिंह दीये की टिमटिमाहट को एन्सेफ्लाईटिस के बिस्तर पर पड़े बच्चों की डगमगाती जिन्दगी से जोड़ते हैं। डॉक्टर सिंह के मुताबिक इस दीपांजली के जरिये नेहरू जी की पवित्र आत्मा को पुकारा जाएगा। अब शायद वही अपने वारिसों की केन्द्र सरकार को बच्चों के प्रति संवेदनशीलता का पाठ पढा सके।

श्रेष्ठिजनो का ड्रामा!

महारास्ट्र विधानसभा में कांग्रेस विधायक अमीन पटेल ने हिन्दी में और बाबा सिद्दीकी ने अंग्रेजी में शपथ ली। फ़िर मराठी में शपथ नहीं लेने पर अकेले अबू आजमी क्यों पीटे गये। आजमी आख़िर क्यों गड़ रहे हैं राज ठाकरे की आंखों में। क्या राज का मकसद सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना है या फ़िर वे इसके आगे की कोई सोची-समझी रडनीति पर काम कर रहे हैं। बीच में से मांग फाड़कर बाल बनने वाले इस 'नौसिखिये' राज में आख़िर क्या है जो वो अपने घाघ चाचा पर भारी पड़ने लगा है। अबू आजमी की पिटाई की खबरों के साथ ९ नवम्बर की रात टेलीविजन पर गोद में कुत्ता लिए हुए राज की तस्वीरें दिखाई जा रही थीं। राज जिस तरह की राजनीती कर रहे हैं 'कुत्ता' उसका प्रतीक हो सकता है। नवनिर्वाचित विधायकों के शपथ ग्रहण समारोह के तीन दिन पहले राज ने मीडिया के सामने बोला था कि किसी विधायक ने गैर मराठी भाषा में शपथ लेने की कोशिश की तो एम्.एन.एस के १३ विधायक उसे देख लेंगे। अबू आजमी ने भी इसका जबाब देते हुए हिन्दी में ही शपथ लेने का इरादा जता दिया। तभी से मीडिया वालों को पूरा भरोसा था की शपथ ग्रहण समारोह में कोई न कोई हंगामेदार ख़बर जरूर मिलेगी। आश्चर्ये नहीं होना चाहिए कि ९ नवम्बर को विधानसभा में अबू आजमी की पिटाई के बाद लोकतंत्र के हिलने जैसे भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करने वाले मीडियाकर्मी पहले से जानते थे कि अबू आजमी पर राज का कहर बरपने वाला है। और जब मीडिया वाले जानते थे तो क्या महारास्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चाह्वाद इतने भोले हैं कि उन्हें कुछ मालूम ही नहीं था। और तो और शायद अबू आजमी भी ये जानते थे कि विधानसभा में इस तरह की घटना हो सकती है। जाहिर है ९ नवम्बर २००९ को महारास्ट्र विधानसभा में जो कुछ हुआ उसकी जानकारी सत्ता पछ से लेकर विपछ और मीडिया तक को पहले से थी। सवाल उठता है कि फ़िर सबने मिलकर ९ नवम्बर को सारे हिंदुस्तान को 'श्रेष्ठीजनों का ड्रामा' देखने पर मजबूर क्यों किया। हिंदुस्तान पहले भी महीनो तक राज ठाकरे की नौटंकी वाली गुंडागर्दी का नज़ारा देख चुका है। राजनीती के आसमान में इस 'अंगुल' भर के शख्स की आख़िर इतनी बड़ी हैसियत क्यों हो गई है कि वो सारे हिंदुस्तान का ध्यान खींचने की ताकत पा गया है। महारास्ट्र में सरकार, पुलिस, विपछ और मीडिया सब राज की राजनीती के शिकार बन गये हैं या फ़िर सब मिलकर राज-राज खेलने लगे हैं? आख़िर बाल ठाकरे के बाद कोई तो चाहिए जो महारास्ट्र की जनता का ध्यान जनता के असल सवालों पर ना रहने दे। ऐसा शख्स सभी के लिए फायदेमंद हो सकता है। यही राजनीती कर बाल ठाकरे उमर भर कामयाब रहे अब राज उनकी जगह ले रहे हैं। कभी छेत्र वाद तो कभी संप्रदायिकता बाल और राज ठाकरे की राजनीती में कोई अन्तर नहीं। इसी तरह राज ठाकरे को लेकर मीडिया और ब्यवस्था का रवैया भी बिल्कुल वैसा ही है जैसा कभी बाल ठाकरे को लेकर था। जाहिर है कभी बाल ठाकरे महारास्ट्र की राजनीती में अपरिहार्ये थे, आज राज ठाकरे हैं। कांग्रेस, बीजेपी, सपा और बाकि पार्टियाँ भी अपनी-अपनी भूमिका तलाश रहे हैं। जैसे ९ नवम्बर को अबू आजमी ने अपनी भूमिका तलाशी। तय है...... महारास्ट्र में राज, राजनेताओं और मीडिया की नौटंकी अभी जारी रहेगी।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

मधु कोडा ने नया क्या किया

झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा पर चार हज़ार करोड के घोटाले का आरोप लगा है। सीबीआई जाँच शुरू होते ही जैसा की हर बड़े आदमी के साथ होता है मधु की तबियत भी बिगड़ गई है। टेलीविजन के परदे पर मधु को स्ट्रेचर पर रखकर अस्पताल ले जाते देखना और उनके पिता को गुस्से के साथ बिलखता देखना किसी को अच्छा नही लग सकता। लेकिन भारत में सार्वजनिक जीवन का वरण कर लोकहित की शपथ लेने वालों की ऐसी तस्वीरें अक्सर दिख जाती हैं। नरसिम्हा राव, सुखराम, सीबू सोरेन, लालू यादव, मायावती जैसों की एक लम्बी फेहरिस्त है। ऐसे नेताओं ने बार-बार हमारी नज़रो के सामने अपना असली चेहरा उजागर किया है। हमसे इनके बारे में कुछ भी छुपा नहीं है। बहन जी तो साफ-साफ बताती भी हैं कि उनका जन्मदिन कई सालों से पार्टी के लिए सहयोग दिवस के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। बहन जी का तर्क है कि उनकी पार्टी गरीबों के चंदे से चलती है जबकि बाकी पार्टियाँ उद्द्योगपतियों से पैसा लेती हैं। अब बहन जी की पार्टी उद्द्योगपतियों से पैसा लेती है या नहीं ये तो जाँच का विषय है लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं की भारत के ज्यादातर राजनीतिक दल बडे-बडे उद्दोगपतियों से करोड़ों में चंदा लेते रहे हैं। जाहिर है इस चंदे के बदले ये उद्दोगपति भी सत्ता में आने के बाद राजनीतिक दलों से अपना मुनाफा जरूर वसूलते होंगे। अगर ये सच है तो फ़िर सोच लीजीये भारत में भ्रस्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। हाल में उच्चतम न्यायलय के जस्टिस काटजू ने कहा की भारत में भ्रस्टाचार की समस्या का कोई इलाज नहीं। कुछ लोगों को याद होगा कि प्रधानमंत्री रहते इन्द्र कुमार गुजराल ब्यवस्था से इतने नाराज़ हुए कि एकबारगी धरने पर बैठने जा रहे थे। भारत में ब्यवस्था के बिगड़ने और भ्रस्टाचार के इतने बडे सबूत मिल चुके हैं की अब इस बारे में कुछ कहना-सुनना बाकी नहीं रहा। लेकिन सवाल ये है कि क्या भ्रस्टाचार हमारे लिए कोई मुद्दा है। क्या हम पर इस बात का कोई फर्क पड़ता है कि हमारे नेता और अधिकारी मिल कर हमें लूटने लगे हैं। प्रथम विश्व युद्घ के बाद जर्मनी की खस्ता हालत के अलावा भ्रस्टाचार एक बड़ा मुद्दा था जिसने हिटलर को जन्म दिया। हिटलर की हम चाहे जितनी आलोचना करें और उस कत्लेआम के लिए करनी भी चाहिए लेकिन सच ये है कि हिटलर ने ही उस दौर में जर्मनी को तबाही से उबारकर एक मजबूत अर्थब्यवस्था दी थी। भारत में अभी वैसे हालात नहीं लेकिन बढती महंगाई, मंदी और गरीबी के चलते हालात बेहतर भी नहीं कहे जा सकते। आज-नहीं तो कल हमें इस बारे में सोचना ही होगा। हम नहीं सोचेंगे तो कोई हिटलर हमें सोच्वायेगा। बेहतर होगा अगर हम ख़ुद ही इन मुद्दों पर सोचना शुरू करें और वोट देते वक्त इन्हें याद रखें। ताकि मधु कोडा जैसे तस्वीरें भारत में आम ना रहें।

कमी खलेगी प्रभाष जी की

पत्रकारिता की दुनिया में प्रभाष जोशी का नाम लंबे अरसे से बडे सम्मान से लिया जाता रहा है। जब भी इस छेत्र में कुछ नये सवाल उठ खड़े हुए प्रभाष जी ने बड़ी उदारता से नई पीढी को उनका उत्तर तलाशने में मदद की। प्रभाष जी के बारे में लिखने को बहुत कुछ है लेकिन आज इस मौके पर नही.......अभी तो बस इतना ही कि हम बेहद गमजदा हैं.

सोमवार, 2 नवंबर 2009

पहले एक दीया इनके लिए रौशन कर दूँ

छपाक के एक पाठक ने 'क्या सरकार झूठ बोलती है' शीर्षक वाली खबर पर प्रतिक्रिया में लिखा है कि छपाक पर एन्सेफ्लाईटिस के अलावा भी कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया जाना चाहिए। निसंदेह....छपाक पर अभी तक सबसे ज्यादा सामग्री एन्सेफ्लाईटिस से सम्बंधित ही रही है। मैं मानता हूँ कि जब हमने छपाक के जरिये ठहरे हुए पानी को सड़ने से बचाने का बीडा उठाया है तो सिर्फ़ एन्सेफलाईटिस नहीं अन्य समसामयिक मुद्दों पर भी हस्तछेप करना होगा। लिहाजा उस पाठक की बात को सर आंखों पर रखते हुए मैं वायदा करता हूँ कि छपाक का दायरा बहुत जल्द बढाया जाएगा।
लेकिन पूरी बिनम्रता के साथ मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि छपाक पूर्वांचल के हजारों बच्चों और बड़ों की मौत का सबब बनने वाली बीमारी एन्सेफ्लाईटिस को किसी भी कीमत पर बख्शने वाला नहीं है। छपाक इस बीमारी के समूल नाश के लिए प्रतिबद्ध है। छपाक के जरिये एन्सेफ्लाईटिस विरोधियों की गोलबंदी जारी रहेगी।
इस बीमारी को मामूली मत समझिये। पूरे ३२ बरस हो गये। पहले तो इसका एक चरित्र था, एक सीजन था। अब ना कोई चरित्र है ना कोई सीजन। बारहों मॉस कहर बरपाती रहती है। मुझे तो ताज्जुब इस बात का है की ३२ बरस में २८ बरस, समाज के किसी विशिष्ट वर्ग (मीडिया सहित ) ने उस ढंग से लग कर कुछ क्यों नहीं किया कि सरकार के बंद कानों तक बात सिर्फ़ पहुंचे नहीं बल्कि सरकार अगर तुंरत कुछ ना करे तो इतना शोर मचे कि उसके कान के परदे ही फटने लगें। तब देखते कि सरकार पूरी तरह बहरी होना पसंद करती है या फ़िर लोगों को बचाने के लिए आगे आती है। ताज्जुब है कि एन्सेफ्लाईटिस के आने के २८ बरस तक तो पूर्वांचल में किसी ने 'चूँ' तक नहीं की। सन १९७८ में जब पहली बार गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में इसके मरीज़ आए तो लोगों ने इसे 'नौकी बीमारी' का नाम दे दिया जो गाँव-देहात में आज तक बदस्तूर कायम है। याद कीजिये....ये वही दौर था जब गोरखपुर, अपराध के अन्तरराष्ट्रिय मानचित्र पर शोहरत पा रहा था। इसी दौर में पूर्वांचल के रणबांकुरे छत्रिय-ब्रह्मण जातीय संवेदना में ओत-प्रोत हो गैंगवार को परवान चढा रहे थे। आज उस गैंगवार की कोख से उपजे कई बाहुबली 'माननीय' जनप्रतिनिधि बनकर विधायिका की शोभा बढा रहे हैं। पूर्वांचल की राजनीत और समाज पर इनकी गहरी छाप है। पूर्वांचल के चुनावों में जातीय और धार्मिक समीकरणों की महत्ता कोई भी विश्लेषक बता देगा। लेकिन इन दोनों समीकरणों की राजनीती करने वालों ने पिछले ३२ बरस में कभी भी एन्सेफ्लाईटिस से तिल-तिल कर मरते हजारों बच्चों और उनके गरीब-बदनसीब माँ-बाप का दर्द बाँटने की कोशिश कभी नहीं की। बात-बात पर खून बहाने वाले नेता भला खून चूसने वाले मच्छरों के खिलाफ होते भी तो कैसे। बल्कि इन दोनों खूनचूसवों के बीच ३२ सालों से एक प्रकार की दुरभिसंधि जैसी है। ना मच्छर इन्हें काटते हैं और ना ये मच्छरों को ख़त्म करने के लिए कुछ करते हैं।
अब बात मीडिया की। गौर करें तो २००५ में एन्सेफ्लाईटिस के महामारी की शक्ल लेने से पहले तक मीडिया की रिपोर्टिंग ज्यादातर रश्मी रही। २००५ में मीडिया ने गोरखपुर से लखनऊ और दिल्ली तक पहली बार अपनी ताकत का ठीक से एहसास कराया। इसका नतीजा भी निकला। तत्कालीन राज्यपाल टी.वी.राजेश्वर से लेकर राहुल गाँधी तक गोरखपुर पहुंचे। तब एन्सेफ्लाईटिस उन्मूलन की लड़ाई लड़ रहे डॉक्टर आर.एन.सिंह और उनके चिकित्सक कुनबे ने जोर-शोर से मांग उठाई। डॉक्टर के.पी.कुशवाहा और ऐ.के.राठी मुखर हुए। मीडिया के दबाव ने सरकार को चीन से टीकों का आयात करने पर मजबूर कर दिया। इस तरह पूर्वांचल में २८ सालों से मौत फैला रही बीमारी से निपटने की कोशिश पहली बार शुरू हुई। उसी समय एन्सेफ्लाईटिस से मरने और विकलांग होने वालों के लिए मुआवजे, सूअरबाड़ों को आबादी से दूर ले जाने और मच्छरों को मिटाने के लिए एरिअल फोगिंग की बात भी जोर-शोर से उठी। मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर आर.एन.सिंह ने राहुल गाँधी को एरिअल फोगिंग का महत्व समझाया। उन्होंने बताया-अगर एरिअल फोगिंग हो जाए तो बीमारी का प्रकोप तुंरत कम हो जाएगा। डॉक्टर सिंह की बात राहुल गाँधी की समझ में आई। उन्होंने लौटकर तुंरत हेलीकॉप्टर भेजा लेकिन 'कहीं उत्तर प्रदेश में राहुल की राजनीती चटक ना जाए' इस आशंका में घुली जा रही तत्कालिन मुलायम सरकार ने उक्त हेलीकॉप्टर को रायबरेली से उड़ने नहीं दिया। ठीक इसी तरह की सोच से पीड़ित मायावती सरकार ने भी सत्ता में आते ही मुलायम राज में शुरू किए गये मुआवजे को बंद कर दिया है।
जाहिर है, ३२ बरस से एन्सेफ्लाईटिस के तांडव को ख़त्म करने के बजाये यूपी की सियासी पार्टियाँ गन्दी सियासत का खेल खेल रही हैं। पूर्वांचल की भोली-भली शांतिप्रिय गरीब जनता को भेंड-बकरी समझ रखा है सियासी पार्टियों ने। हद दर्जे की संवेदनहीनता से ग्रसित हमारे नेताओं को गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के वार्ड नम्बर ६० में एक-एक बिस्तर पर पिछले ३२ सालों में मर चुके सवा-सवा- सौ बच्चों की लाश दिखाई नहीं पड़ती। उन्हें तो आज भी वहां एक-एक बिस्तर पर दो-दो, तीन-तीन बीमार बच्चे और उनके माँ-बाप की परेशानी से कोई वास्ता नहीं। ना कोई शर्म है, ना कोई समझ! ..... और जागरूकता का आलम ये है- आज भी जनता वोट देते वक्त अपने बच्चों की मौत का हिसाब मांगने के बजाये साड़ी-शराब पाकर खुश होती है।
ऐसे हालत में एक पत्रकार होने के नाते अगर एन्सेफ्लाईटिस पर ठीक से नहीं लिखूंगा तो क्या माँ सरस्वती मुझसे प्रसन्न रहेंगी। कोई भी व्यक्ति देश-काल की परिस्थितियों से मुहं नहीं छिपा सकता। महान पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी ने साम्प्रदायिकता से लड़ते-लड़ते अपने प्राणों का बलिदान कर दिया था। तो क्या हम आज हमारे छेत्र की ज्वलंत समस्या एन्सेफ्लाईटिस के खिलाफ अपनी कलम भी नहीं चलाएंगे। बल्कि मैं तो समाज के सभी वर्गों से आह्वान करता हूँ की एन्सेफ्लाईटिस उन्मूलन के लिए जो कुछ कर सकते हैं, जरूर करें। जो कवि-कहानीकार हैं वे एन्सेफ्लाईटिस से उजाड़ दुनिया में अपनी कविताओं- कहानियों के पात्र ढूँढें। वकील सरकारी चुप्पी के खिलाफ अदालतों में जाएँ। डॉक्टर समर्पित होकर एन्सेफ्लाईटिस पीडितों का मुफ्त इलाज करें। सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर आर.एन.सिंह की तरह कुछ गांव चुनकर वहां एन्सेफलाईटिस उन्मूलन के पॉँच सूत्रों को लागू कराएँ। धनवान एन्सेफलाईटिस उन्मूलन के काम में धन से सहयोग करें। नौजवान उन नीप ग्रामो में अपना श्रम दें जहाँ एन्सेफ्लाईटिस ख़त्म करने के प्रयासों को अमली जमा पहनाया जा रहा है। बाहुबली 'माननीय विधायिकाओं में पुरजोर ढंग से एन्सेफलाईटिस उन्मूलन की मांग उठायें। पंडित और मौलवी एन्सेफ्लाईटिस से मुक्ति के लिए इश्वर की प्रार्थना करें। विद्यार्थी गांव-गांव में लोगों को एन्सेफ्लाईटिस से बचने के उपाय बताएं। .......और जो कुछ नहीं कर सकते वे कम से कम अपनी आँखें नम किए उन बच्चों को उठाने में मदद करें जिन्हें बीमार हालत में अस्पताल या फ़िर मौत के बाद शमशान ले जाते वक्त बदनसीब माँ-बाप के कंधे जबाब दे देते हैं।

शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

तो क्या सरकार झूठ बोलती है?




२३ जुलाई २००९ को उत्तर प्रदेश के चिकित्सा मंत्री अनंत मिश्रा एक अन्य मंत्री लालजी वर्मा और प्रमुख सचिव हरभजसिंह के साथ गोरखपुर पहुंचे। वहां मीडिया के सवालों का जबाब देते हुए इन मंत्रियों ने सीना चौड़ा करके बड़े शान से कहा था कि सरकार की कोशिशों के चलते उत्तर प्रदेश से जापानी एन्सेफ्लाईटिस का सफाया हो गया है। लेकिन अब बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज से आई एक रिपोर्ट ने इन मंत्रियों को झूठा साबित कर दिया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि इस साल अभी तक आए एन्सेफ्लाईटिस के २२७० मरीजों में से २८७ में जापानी एन्सेफलाईटिस की पुष्टि हुई है। गौरतलब है कि मेडिकल कॉलेज में अब तक ४१६ बच्चे जापानी और एक्यूट एन्सेफ्लाईटिस के चलते जान गवां चुके हैं।


एन्सेफ्लाईटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कम्पेनर डॉक्टर आर.एन.सिंह ने इस पूरे मामले को अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। डॉक्टर सिंह के मुताबिक सरकार ने अगर टीकाकरण में ईमानदारी बरती होती तो वाकई अभी तक जापानी एन्सेफलाईटिस का नामोनिशान मिट चुका होता। डॉक्टर सिंह शुरू से कहते आए हैं कि जापानी एन्सेफ्लाईटिस के टीके की कम से कम दो खुराक दी जाए तभी इसका सार्थक नतीजा मिल पायेगा। डॉक्टर सिंह आश्चर्य जताते हुए कहते हैं कि बार-बार चेताने के बावजूद सरकार ने टीकों की सिर्फ़ एक खुराक लगवाई। नतीजतन इतनी मुश्किल से शुरू हुआ टीकाकरण अभियान अपना मकसद पूरा नही कर सका। डॉक्टर सिंह के मुताबिक सरकार को तत्काल एन्सेफ्लाईटिस को नोटीफाईबल बीमारी घोषित करके एरिअल फोगिंग और सूअरबाड़ों को आबादी से दूर करने जैसे प्रभावी कदम उठाने चाहियें। इससे निश्चित ही जापानी एन्सेफ्लाईटिस पर काबू पाया जा सकता है। डॉक्टर सिंह के मुताबिक एस.ऐ १४-१४- २ नामक इस टीके की दूसरी खुराक न लगे तो पहली खुराक की प्रतिरोधक छमता सिर्फ़ ३३ फीसदी रह जाती है।


वैसे पूर्वांचल में एन्सेफलाईटिस के उन्मूलन को लेकर राज्य सरकार का रवैया पहले भी बेहद अफसोसजनक रहा है। सत्ता में आते ही माया सरकार ने एन्सेफ्लाईटिस से मरने वालों के परिज़नों के लिए २५ हज़ार और विकलांग होने वालों के लिए ५० हज़ार रुपयों के मुआवजे पर रोक लगा दी। ये मुआवजा पिछली मुलायम सरकार ने शुरू किया था। पिछली सरकार के निर्देशों और योजनाओं को ग़लत ठहराने के होड़ में माया सरकार को एन्सेफलाईटिस से प्रभावित गरीबोंकी स्थिति का जरा भी एहसास नहीं रहा। हर साल की तरह इस साल भी एन्सेफ्लाईटिस ने गोरखपुर और आसपास के जिलों में मौत बरपा रखी है लेकिन मुख्यमंत्री मायावती ने आज तक इस महत्वपूर्ण विषय पर एक शब्द नहीं बोला। डॉक्टर सिंह के मुताबिक समझ नहीं आता कि सूबे की मुख्यमंत्री इतने बड़े मुद्दे पर खामोशी कैसे अख्तियार कर सकती हैं। डॉक्टर सिंह ने गरीबों-दलितों के बीच घूमकर मिशन २०१२ कामयाब बनाने का मंसूबा संजोये राहुल गाँधी की कार्यशैली पर भी सवाल उठाया है। डॉक्टर सिंह के मुताबिक राहुल गाँधी और केन्द्र सरकार ने २००५ की महामारी के तुंरत बाद तो संवेदनशीलता दिखाई लेकिन लंबे समय से चुप्पी साधे बैठे हैं। केन्द्र सरकार अगर संवेदनशील होती तो एन्सेफ्लाईटिस के समूल नाश के लिए तत्काल एक रास्ट्रीय कार्यक्रम 'नीप' या किसी और नाम से लागू कर देती। डॉक्टर सिंह बारी-बारी सपा-भाजपा-बसपा और कांग्रेस सबकी पोल खोलते हैं। उनके शब्दों में,'साफ हो चुका कि किसी पार्टी या सरकार के असली एजेंडे में गरीब बच्चे और एन्सेफ्लाईटिस उन्मूलन नहीं है। इसलिए अब हम 'इस देश के वासी' ख़ुद एन्सेफलाईटिस उन्मूलन का बीडा उठा रहे हैं।' डॉक्टर सिंह ने गोरखपुर मंडल के तीन जिलों के तीन गावों को चुन कर वहां नीप के सभी सूत्रों को लागू करने का एलान किया है। इन गावों को नीप ग्राम का नाम दिया गया है। कुशीनगर और गोरखपुर की सीमा पर स्थित गांव होलिया सबसे पहले चिन्हित किया गया है।

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

सबसे बड़ा संपादक


सन २००५ की बात है. गोरखपुर में एन्सेफ्लाएटिस महामारी की शक्ल ले चुकी थी. मैं उन दिनों ईटीवी में  सीनिअर रिपोर्टर और गोरखपुर डीविजनल सेण्टर का इंचार्ज था. खबरनवीस होने के नाते एन्सेफ्लाएटिस को कवर करने के लिए मैं अपने कैमरामैन अखिलेश पाण्डेय  के साथ लगभग रोज़ मेडिकल कॉलेज के वार्ड नंबर ६० में जाया करता था. यों तो ये वार्ड बच्चों का है लेकिन जब एन्सेफ्लाएटिस मरीजों की तादात बढती है तो इसे एन्सेफ्लाएटिस वार्ड का नाम दे दिया जाता है. आजकल चूँकि पूरे साल एन्सेफलाएटिस के मरीज़ आते रहते हैं और जाहिर है इनमे से ज्यादातर बच्चे होते हैं इसलिए बच्चों के इस वार्ड को स्थाई तौर पर एन्सेफ्लाएटिस वार्ड का नाम दे दिया गया है.
इस वार्ड की तस्वीरें आज भी बिलकुल वैसी ही हैं जैसी तब थीं. एक-एक बिस्तर पर दो-दो, तीन-तीन बच्चे. आक्सीजन मास्क से ढंका उनका चेहरा. नसों में ढेरों सुइयां. उखड्ती सांसें, कराहती सिसकियाँ. वे अपनी टूटती आवाजों में  बामुश्किल,  'पापा.....वो......पापा......अम्मा......वो अम्मा.....बुदबुदाते हैं. मानो कह रहे हों कि 'ऐ पापा.....क्या तुम हमें इन सुइयों से भी नहीं बचा सकते?' 'अम्मा.....तुम्हारी छाती से लगकर अभी तो हमने दुनिया में जीने की पहली कोशिश ही की थी. क्या इतनी जल्दी तुम्हारा आँचल छूट जायेगा! क्या तुम कुछ भी नहीं कर सकती......माँ! अस्पताल के इस बिस्तर पर  तुम कैसे छोड़ जाओगी मुझे? वापस जाते वक्त...... मेरा निर्जीव शरीर, क्या समा पायेगा तुम्हारे आँचल में...... पापा! जिनकी उँगलियाँ पकड़कर मुझे चलना सीखना था.... क्या उनसे मेरी लाश उठाई जायेगी?'


उन मासूमों की आँखों में मुझे ऐसे ही ना जाने कितने सवाल नज़र आते थे. उन दिनों शायद ही कोई ऐसा दिन गुज़रा जब मैं और अखिलेश बिना अपनी आँखें नम किये वापस लौट पाए. तत्कालीन चिकित्सा मंत्री जयवीर सिंह के दौरे के वक्त, अपनी गोद में १२ साल के बच्चे की लाश उठाये सीढियों से उतरते  उस पिता का चेहरा, मुझे नहीं लगता कि रोज़ जाने

कितने चेहरे अपने कैमरे मैं कैद करने वाला अखिलेश भी भूल पाया होगा. उसकी चीखें आज भी याद आते ही मेरे कानों में गूंजने लगती हैं. मुझे याद है जयवीर सिंह के सामने  वो सीढियों पर लाश लिए बैठ गया था. उसके रुदन ने थोडी देर के लिए मंत्री और उनके पूरे अमले को वहीं ठिठक जाने पर मजबूर कर दिया था. फिर सब आगे बढ़ गये. उस अभागे पिता से मैंने पूछा 'तुम कहाँ के हो'.....पिता ने रोते हुए जबाब दिया 'पीपीगंज.....मिटटी ले जाने के लिए पैसा नहीं है.'  बिना कोशिश किये, मेरा हाथ अपनी जेब टटोलने लगा. मैंने अखिलेश से कैमरा आफ करने को कहा. जेब में सौ का एक नोट था जिसे उसके हवाले करके मैं आगे बढने लगा तो अचानक उसने पैर पकड़ लिए. मुझे उसकी आखों में बेटे के गम के साथ भयानक बेबसी के भावः भी नज़र आये. उस साल मेडिकल कॉलेज के वार्ड नंबर ६० को एक से बढ़कर एक हस्तियों के दीदार हुए. तत्कालीन राज्यपाल टी.वी.राजेस्वर, युवराज राहुल गाँधी, तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, सलमान खुर्शीद और जाने कौन-कौन.
इन्हीं हस्तियों में से तत्कालीन मुख्य सचिव नीरा यादव भी थीं. मेडिकल कॉलेज में उनका आना मुझे दो कारणों से भली-भांति याद है. हुआ यूँ कि नीरा यादव के आने से काफी पहले पुलिस और जिला प्रशासन के अधिकारियों ने गंभीर रूप से बीमार मरीजों को एक अलग वार्ड में छिपा दिया था. डर था कि कहीं श्रीमती यादव के सामने किसी बच्चे की मौत ना हो जाए. परिजनों को बाहर कर दिया गया था. कैमरों को मोटी-मोटी रस्सियों के उस पार और पत्रकारों को वार्ड के एक कोने में समेट कर प्रशासन ने अपनी तैयारी पूरी कर ली थी. नीरा यादव आईं. चेहरे पर संवेदना लाने की कोशिश करते हुए आगे बढीं. वार्ड में खासतौर से समझा-बुझाकर रोके गये साफ-सुथरे परिजनों और कुलीन डॉक्टरों से ना सुन सकने जितनी धीमी आवाज़ में बातें करती हुईं वे आगे बढ़ रही थीं. कैमरे धड़ाधड़ फ्लैश चमका रहे थे. पत्रकार भी उचक-उचक कर अपनी जिज्ञासा मिटा रहे थे. सब कुछ ठीक-ठाक ही था. इलेक्ट्रोनिक चैनल वालों की बाईट भी हो चुकी थी. कोई बखेडा ना खडा होने के चलते राहत महसूस कर रहे अधिकारी अब नीरा को विदा करने की तैयार में थे कि तभी उनका बना-बनाया खेल बिगड़ने लगा. छुपाकर रखे गये बगल के वार्ड में एक बच्ची की हालत अचानक बिगड़ गयी. इधर डॉक्टर बच्ची के सीने को पम्प कर रहे थे उधर उसके माँ-बाप का रो-रोकर बुरा हाल था. बच्ची की हर टूटती साँस के साथ उनका रोना बढता जा रहा था. अचानक उन्हें एहसास हुआ कि अब उनकी बच्ची नहीं बचेगी. इस एहसास ने उनके रुदन को चीखों में बदल दिया. लेकिन इससे पहले कि ये चीखें  नीरा यादव के कानो तक पहुँचती प्रशासन के हिमायती हाथों ने हलक में ही उन्हें रोक दिया. बिस्तर पर जिनकी बच्ची मर रही थी बगल में उन माँ-बाप के मुंह को कस कर दबाये अधिकारी उन्हें धमकाए जा रहे थे. अधिकारियों के इस पाप को मेरे कैमरामैन ने अपने कैमरे में कैद किया और हमने ईटीवी पर उसे दिखाया भी.
लेकिन उस वक्त मन में इसे खबर के रूप में दिखाने से ज्यादा ईश्वर में अपनी अटूट आस्था के खिलाफ एक विचार पनप रहा था. आखिर इस वार्ड में हर रोज़ मरते छोटे-छोटे मासूम बच्चों ने क्या पाप किया है, जिसकी सजा में ईश्वर इन्हें मौत बाँट रहा है? मैंने यही सवाल अपने पास खड़े हिंदुस्तान गोरखपुर के इंचार्ज और सीनिअर जर्नलिस्ट हर्षवर्धन शाही से किया? मेरे सवाल के जबाब में शाहीजी ने जो उत्तर दिया वो सही था या गलत, ये तो मैं तय नहीं कर पाया लेकिन आज तक मुझे उससे बेहतर संतावना नही सूझी. शाहीजी ने कहा,'' जैसे तुम कोई स्क्रिप्ट फाइनल करने से पहले जाने कितने शब्द लिखते और मिटा देते हो शायद ईश्वर भी ऐसा ही करता हो. आखिर इस संसार का सबसे बड़ा संपादक तो वही है ना!"
              Rahul_Gandhi_With_Patient_of_encephlaitis

आठ सौ में से सिर्फ सौ करोड खर्च करो, सूबे में मिट जायेगा एन्सेफलाएटिस: डॉक्टर आर.एन.सिंह

भ्रस्टाचार की शिकायतों के चलते काफी हील-हुज्ज़त हुई. लेकिन आखिरकार केन्द्र सरकार ने विश्र्वबैंक की वित्तीय मदद से प्रस्तावित यूपी हेल्थ सिस्टम डेवलपमेण्ट प्रोजेक्ट (यूपीएचएसडीपी)के दूसरे चरण को मंजूरी दे दी है। करीब 800 करोड़ रुपये लागत के इस प्रोजेक्ट पर विश्र्वबैंक पहले ही सैद्धान्तिक सहमति जता चुका है। उम्मीद है कि प्रोजेक्ट अगले वर्ष शुरू हो जाएगा।  केन्द्र सरकार की हरी झंडी के साथ ही प्रोजेक्ट की राह पूरी तरह प्रशस्त हो गई। अब जल्द ही विश्र्वबैंक के साथ इसके प्रारूप पर बातचीत शुरू होगी. सैद्धान्तिक तौर पर तय किया जा चुका है कि यूपीएचएसडीपी में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के सिर्फ वही क्षेत्र शामिल किये जाएंगे, जो नेशनल रूरल हेल्थ मिशन द्वारा आच्छादित नहीं हैं। लिहाज़ा एन्सेफलाएटिस उन्मूलन अभियान के चीफ काम्पेनर डॉक्टर ने मांग की है कि राज्य सरकार इस धनराशि में से सौ करोड रुपये खर्च करके एन्सेफलाएटिस उन्मूलन का प्रादेशिक कार्यक्रम 'रीप' लागू करा दे.
डॉक्टर सिंह के मुताबिक रीप कुछ और नहीं बल्कि नीप का ही प्रादेशिक स्वरुप होगा. उनके मुताबिक महज़ सौ करोड रुपयों में टीकाकरण, एरिअल फोग्गिंग, सूअरबाड़ों का नियंत्रण इत्यादि नीप में शामिल सभी प्रमुख बिन्दुओं का अनुपालन कर 'जापानी एन्सेफ्लाएटिस ' पर पूरी तरह से काबू पाया जा सकता है. यही नहीं 'कोक्सेकी' से होने एक्यूट एन्सफ्लाएटिस पर भी सूर्य की विकरित किरणों द्वारा पेयजल को शुद्ध कर काबू पाया जा सकता है. उल्लेखनीय है कि पिछले साल गोरखपुर पहुंची सी.डी.सी की टीम के सामने भी डॉक्टर सिंह पेयजल शुद्ध करने के अपने फार्मूले का प्रदर्शन कर चुके हैं. सी.डी.सी टीम में शामिल डॉक्टरों का रुख इस फार्मूले को लेकर काफी उत्साहित करने वाला था. उनके मुताबिक भारत जैसे विकासशील देश में ये फार्मूला गरीब तबकों की शुद्ध पेयजल तक पहुँच को आसान बना सकता. जो काम आज़ादी के ६२ वर्षों तक सरकारें नहीं कर पायीं वो सूर्य की किरणों के सही इस्तेमाल से हो सकता है. इसी कांसेप्ट पर मेलबर्न की एक यूनिवरसिटी में में शोध भी चल रहा है. डॉक्टर सिंह के मुताबिक कोई तकनीक विदेश से चल कर आये इससे पहले हमारी सरकार को ये देसी फार्मूला गाँव-गाँव तक लोकप्रिय बना देना चाहिए.
बहरहाल, बात करते हैं विश्व बैंक की उस सहायता की जिसके तहत राज्य सरकार को आठ सौ करोड रुपये मिलने हैं. अबकी इस योजना में नीतिगत सुधारों पर खासा जोर दिये जाने की सम्भावना है। प्रोजेक्ट की तैयारी से जुड़े एक अधिकारी के मुताबिक दूसरे चरण में नर्सिग व पैरा मेडिकल मानव संसाधन विकास, आयुष प्रशिक्षण, प्रोग्राम मैनेजमेण्ट प्रशिक्षण, मानकों के अनुरूप अस्पतालों का सुदृढ़ीकरण, खाद्य एवं औषधि प्रशासन का विकास, उपार्जन प्रणाली में सुधार तथा एक डेटा रिसोर्स सेन्टर जैसे क्षेत्र शामिल किये जाने का प्रस्ताव है। प्रोजेक्ट के संचालन में जहां सम्भव होगा, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का भी इस्तेमाल किया जाएगा। ज्ञातव्य है कि यूपीएचएसडीपी का 478.08 करोड़ रुपये (109.65 मिलियन यूएस डालर) लागत का पहला चरण जुलाई, 2000 में 28 चुनिन्दा जिलों में शुरू हुआ था, लेकिन निर्धारित अवधि दिसम्बर, 05 तक पूरी धनराशि व्यय न हो पाने के कारण प्रोजेक्ट को दिसम्बर, 08 तक खींचा गया। राज्य सरकार जनवरी, 09 में प्रोजेक्ट का दूसरा चरण शुरू करना चाहती थी। इसके लिए 800 करोड़ रुपये लागत का प्रस्ताव विश्र्वबैंक के सामने पेश भी किया जा चुका था किन्तु इसी बीच केन्द्र व राज्य सरकार की कार्यशैली से नाखुश विश्र्वबैंक ने प्रोजेक्ट के दूसरे चरण को मंजूरी देने से मना कर दिया था। बहरहाल, प्रदेश शासन के अधिकारियों ने हथियार नहीं डाले। उनके प्रयास से गत जनवरी में दिल्ली में केन्द्र सरकार के उच्चाधिकारियों के साथ बैठक आयोजित की गई, जिसमें राज्य सरकार को कई नयी शर्तो व बन्दिशों के साथ नया प्रोजेक्ट तैयार करने का निर्देश दिया गया। अन्तत: अधिकारियों की कवायद रंग लायी और अब केन्द्र सरकार की मंजूरी मिल जाने के बाद अगले वर्ष पूर्वा‌र्द्ध में ही प्रोजेक्ट का दूसरा चरण शुरू हो जाने की उम्मीद नजर आने लगी है।

छपाक की चिंता फिलहाल टली


छपाक ने दो दिन पहले गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में रुपयों की कमी के चलते इन्सेफेलाइटिस पीडितों के इलाज में आ रही दिक्कतों का खुलासा किया था. छपाक ने बताया था कि अगर हालत नहीं सुधरी तो स्थिति विस्फोटक हो सकती है. इस मुद्दे को  इन्सेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कम्पेनर डॉक्टर आर.एन.सिंह ने भी जोर-शोर से उठाया था. उन्होंने सरकार को आग से ना खेलने की चेतावनी देते हुए अपने आन्दोलन को इलाज़ के स्तर तक ले जाने का ऐलान किया था. उल्लेखनीय है की अभी तक  इन्सेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के लोग इलाज़ के स्तर पर सरकार की भूमिका से संतुष्ट रहे हैं. उनकी मांग इन्सेफेलाइटिस उन्मूलन के लिए समग्र योजना 'रास्ट्रीय इन्सेफेलाइटिस उन्मूलन कार्यक्रम-नीप' लागू करने की है. लेकिन अब उनका गुस्सा इलाज़ के मुद्दे पर भी साफ नज़र आने लगा है. डॉक्टर सिंह के शब्दों में,' नीप लागू करने या करवाने में नाकाम राज्य और केंद्र की सरकारें अब इलाज़ के स्तर पर भी नाकाम साबित होने लगी हैं. सरकार चलाने वाले शायद भूल गये हैं कि जनता ही है जो सरकारों को जनती है. सरकार ने लोगों की आँखों में सिर्फ आंसू दिए हैं. कहीं ऐसा ना हो की ये सरकारें जनता के इन्हीं आंसुओं में बह और ढह जाएँ.'  स्थानीय मीडिया ने भी इस खबर को संजीदगी से उठाया. नतीजा ये हुआ कि  शासन ने दवाओं के लिये ना सिर्फ पचास लाख रुपयों की मंजूरी दे दी है बल्कि दो करोड़ रुपये और देने का मन बनाया है. शासन


इस कार्यवाही के चलते मेडिकल कालेज में भर्ती  इन्सेफेलाइटिस मरीजों के लिये दवाओं का संकट फिलहाल टल गया है। इन्सेफेलाइटिस के ढाई सौ से अधिक मरीजों के लिये दवाओं का बजट खत्म होने से परेशान कालेज के प्रधानाचार्य डा. राकेश सक्सेना इसके लिये बुधवार को लखनऊ पहुंचे थे। डा. सक्सेना अपने साथ दवाओं के बजट के लिये दो प्रस्ताव ले गये थे जिसमें एक दो करोड़ का था जबकि दूसरा पचास लाख का था।  प्रधानाचार्य डा. सक्सेना के अनुसार शासन ने मामले को गम्भीरता से लेते हुए फिलहाल पचास लाख रुपये की मंजूरी दे दी है और इसको जारी करने की प्रक्रिया चल रही है। उम्मीद है कि दो करोड़ रुपये का प्रस्ताव भी जल्द ही मंजूर हो जायेगा और यह धनराशि मिल जायेगी।
मेडिकल कालेज में भर्ती इन्सेफेलाइटिस के ढाई सौ तथा अन्य मरीजों पर होने वाले खर्च को देखते हुए अब दवाओं का बजट काफी कम बचा है। अप्रैल 2008 में शासन ने मेडिकल कालेज को दवाओं के मद में दो करोड़ रुपये दिये थे। लेकिन अगस्त महीने से कालेज के इन्सेफेलाइटिस समेत अन्य मरीजों की भीड़ बढ़ने से दवाओं, रसायनों व आक्सीजन इत्यादि पर होने वाला खर्च काफी बढ़ गया था। पिछले एक हफ्ते से इन्सेफेलाइटिस के मरीजों की तादाद बढ़ने से यह सिर्फ इन्सेफेलाइटिस मरीजों पर रोजाना दो लाख रुपये का खर्च आने लगा है। नेहरू अस्पताल में भर्ती अन्य मरीजों को मिलाकर यह खर्च रोजाना लगभग ढाई लाख रुपये तक पहुंच गया है।

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

गाँधी बेमिसाल हैं


इतिहास के जिस कालखंड में गाँधी हुए वो पूरी दुनिया में मानवता की बड़ी त्रासदियों के लिए याद किया जाता है. हिटलर उसी दौर में यहूदियों को उनके बच्चों समेत गैस चेम्बरों में भिजवा रहा था तो मित्र राष्ट्रों ने शक्ति संतुलन के लिए पूरी दुनिया को विश्व युद्घ के हवाले कर दिया था. हेरोशिमा और नागासाकी पर उसी दौर में अमेरिका ने एटोमिक विस्फोट किये थे. सत्ता और संसाधनों की जंग ने पूरी दुनिया को बर्बादी और इंसानियत को शर्मनाक कुकृत्यों के हवाले कर दिया था. ऐसे दौर में गाँधीजी ने सत्य और अहिंसा को अपना हथियार बनाया. गांधीजी कहते हैं, ' मुझे दुनिया को कोई नयी चीज नहीं सिखानी है. सत्य और अहिंसा के सिद्धांत हमेशा से हैं.' सही है ....तथागत और महावीर ने दुनिया को सत्य और अहिंसा का ही रास्ता बताया था. हिन्दू धर्म के ग्रन्थ भी इसी सिधान्त की बात करते हैं. लेकिन गाँधीजी के पहले सत्य और अहिंसा को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर दुनिया में कहीं भी जंग नहीं  लड़ी गयी थी. भारत में भी क्रांतिकारियों के अलावा उनके बहुत से साथियों को भी इन हथियारों की बदौलत मुक्कमल कामयाबी मिलने पर यकीन नहीं था. चौरी-चौरा कांड के बाद भारत छोडो आन्दोलन स्थगित करने के फैसले का खुद नेहरु तक ने विरोध किया था. लेकिन गाँधी तो गाँधी थे. अपने शत्रु के लिए भी दिल में कोई मैल नहीं रखना उन जैसा कौन सीख पाया. गाँधीजी ने अपने इन हथियारों के जरिये ना केवल आज़ादी हासिल की बल्कि पूरी दुनिया को एक नया रास्ता भी दिखा दिया. गाँधी जी ने कहा था,'अगर सत्य और अहिंसा से भारत को आज़ादी मिली तो फिर दुनिया के दूसरे गुलाम देश भी इसका अनुसरण करेंगे.' गांधीजी की बात बाद में नेल्सन मंडेला के आन्दोलन की सफलता और ब्रिटिश उपनिवेशों में आज़ादी की बयार से सच साबित हुई. आज भी बहुत से लोग मानते हैं कि गाँधी जी की चली होती तो भारत पाकिस्तान का बंटवारा ना हुआ होता. इश्वर- अल्लाह के नाम पर यों मारकाट ना मची होती. कहते हैं, महान आत्माएं काम पूरा हो जाने के बाद दुनिया में नहीं रहतीं. गाँधीजी भी नहीं रहे. लेकिन सबसे बडे दुःख की बात ये है कि उनकी विरासत सँभालने की जिम्मेदारी उनके बाद किसी ने नहीं उठाई. उन्होंने तो कतई नहीं... जिन्होंने सालों-साल उनके नाम पर राज किया और आज भी उनके नाम का बेजा इस्तेमाल करने में जिन्हें जरा भी शर्म नहीं आती.     

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

एम.सी.आई आग से ना खेले

  
फोटो: मारकंडे मणि त्रिपाठी   
मेरे शहर गोरखपुर को टी.वी चैनलों ने आजकल रामभरोसे बताना शुरू कर दिया है. वाकई! हालात ही ऐसे हैं. ३२ सालों में जो एन्सेफलाईटिस हजारों बच्चों की जान ले चुकी है. इस साल अब तक ३०२ बच्चे उसकी भेंट चढ़ चुके. सबको मालूम है कि गोरखपुर मेडिकल कॉलेज ही वो जगह है जहाँ पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल के हजारों एन्सेफलाईटिस पीडितों का सबसे सस्ता इलाज़ होता है. दूसरी बिमारियों के लिए भी ये जगह गरीबों की उम्मीदों का अकेला सहारा है. लेकिन गाजियाबाद और नॉएडा जैसे शहरों में कई नाकाबिल निजी मेडिकल कालेजों को भी मान्यता देने वाली एम.सी.आई जब-तब गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की मान्यता पर सवाल उठाती रहती है. यहाँ की स्नातकोत्तर मान्यता वो पहले ही रद्द कर चुकी है. हाल में एम.सी.आई ने मान्यता रद्द करने की धमकी फिर दी है. एम.सी.आई को अगर क्वालिटी एजूकेशन की इतनी ही परवाह है तो वो मानकों की सख्ती निजी मेडिकल कालेजों में क्यों नहीं करती?
यहाँ उत्त्तर प्रदेश सरकार के लिए भी एक सवाल है कि जब एम.सी.आई एक नहीं कई बार मानकों का सवाल उठा चुकी है तो फिर मानकों का अनुपालन क्यों नहीं कराया जाता. क्या पूर्वांचल के गरीबों के इलाज की सबसे मुफीद जगह को बचाने के लिए सरकार के पास कुछ करोड भी नहीं हैं? जो भी हो ये तय है की अगर पूर्वांचल के इस संस्थान पर संकट आया तो पूर्वांचल के लोग इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे.  एन्सेफलाईटिस उन्मूलन की मांग को लेकर लोग पहले ही आंदोलनरत हैं. इस साल सरकार ने एन्सेफलाईटिस पीडितों की दवाओं के लिए मेडिकल कॉलेज को २ करोड रुपये दिए थे जो ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुए. मेडिकल कॉलेज में एन्सेफलाईटिस पीडितों का इलाज मुश्किल में पड़ा हुआ है. मान्यता का नया संकट कहीं चिकित्सा विद्यार्थियों  को विचलित ना कर दे. अगर ऐसा हुआ तो इलाज और मुश्किल हो जायेगा. एन्सेफलईटिस उन्मूलन अभियान चला रहे डॉक्टर आर.एन.सिंह कहते हैं, 'उनका आन्दोलन इलाज से ज्यादा समस्या के स्थाई समाधान पर जोर देता है'. लेकिन मान्यता का सवाल और इलाज के लिए धन की कमी, ज़ाहिर है! उनके लिए भी कुछ नये मोर्चे खोल रही है.

बुधवार, 30 सितंबर 2009

हल्ला बोल


चलो ऐसा करें कि एक साजिश रचें
बिछा के बारूदी सुरंगें
उड़ा दें
ये चुप्पी की दुनिया

बीड़ी जलईले जिगर से पिया, जिगर में बड़ी आग है. सुनिधि चौहान का ये गाना पिछले साल बडा मशहूर हुआ. लेकिन पिछले ही साल एक फिल्म आई 'हल्ला बोल' जो अजय देवगन और पंकज कपूर के जबरदस्त अभिनय के बावजूद बहुत सफल नही हो सकी. इस फिल्म में एक बडे फिल्म कलाकार को सड़क पर उतरकर भ्रष्ट राजनीति से लोहा लेते दिखाया गया था. लेकिन लोगों ने परदे पर संघर्ष के बजाये जिगर की आग से बीड़ी जलाना ज्यादा
पसंद किया.
खैर! ये सिर्फ परदे की बात नहीं. असल दुनिया में ऐसा रोज़ हो रहा है. भूख, अन्नाय और बेरोज़गारी बढ़ रही है लेकिन देश का नौज़वान संघर्ष के बजाये अपने जिगर की आग का इस्तेमाल बीड़ी जलाने के लिए कर रहा है. आखिर भगत सिंह और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के इस देश में आज की नौजवान पीढी को हुआ क्या है. आर्थिक उदारीकरण के फलस्वरूप देश के हजारों नौजवानों को नए अवसर मिले इसमें कोई शक नहीं. लेकिन जिस देश में तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती हो उस देश के नौज़वानों को क्या अपने जिगर की आग का ऐसा इस्तेमाल करना शोभा देता है. पॉँच सितारा जिन्दगी जीने वालों की नक़ल करके आखिर हम कब तक देश की असल तस्वीर से मुंह छिपाते रहेंगे. 'जो भी हो हमारी बला से' वाली धारणा कब तक हमारे कम आयेगी. आइये हम 'छपाक' से अपनी जिम्मेदारी का एहसास करें और दुनिया को बता दें कि हम अब  इस पानी को और सड़ने नहीं देंगे. 'छपाक' एक
आह्वान है, भूख, गरीबी, बीमारी, अत्याचार और भ्रष्टचार से लड़ने के लिए. हाँथ बढाइये........आप चुप तो बहुत रह चुके.        

लीक पर वे चलें जिनके

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।
साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट,
उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं ।
शेष जो भी हैं-
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ;
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़,
हिलती क्षितिज की झालरें;
झूमती हर डाल पर बैठी
फलों से मारती
खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।
लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।

छपाक की क्या जरूरत?

क्या आपने कभी ठहरे हुए पानी में पत्थर मरकर देखा है. 'छपाक'........ यही आवाज आती है ना. फिर पानी में तरंगें उत्पन्न होने लगती हैं. एक हलचल सी मच जाती है. दरअसल हमारे यहाँ सामाजिक ब्यवस्था भी उसी पानी की तरह है जिसमें अगर देर तक हलचल ना हो तो ठहराव आ जाता है. ये ठहराव यदि लम्बा खिंचा तो सडन पैदा हो सकती है. जाहिर है सडन से बचने के लिए बार-बार-लगातार हलचल पैदा करते रहना जरूरी है. जब प्रवाह के सब रास्ते बंद हों तो यही एक तरीका है. पत्थर मारो! 'छपाक-छपाक' की आवाज़, शायद किसी दिन सफाई के लिए जिम्मेदार कानों तक पहुँच जाये और वे, प्रवाह का रास्ता बनाने को, मजबूर हो जायें. ऐसा हुआ तो प्रवाह का रास्ता ही नहीं बनेगा बल्कि पानी की सडन भी रुकेगी. पानी स्वच्छ और निर्मल हो जायेगा.  

यादें










पूर्वांचल के नेताओं को खुला पत्र: 'एक मच्छर ने तुम्हें .......क्या बना दिया'?

'Culex tritaeniorhynchus' जी हाँ यही नाम है उस मच्छर का जिसने पिछले ३२ साल से पूर्वांचल में तहलका मचा रखा है. उसी पूर्वांचल में जहाँ एक से एक बाहुबली- विधायक, सांसद बने फिरते हैं. मज़ाल है कि इनकी नाक पर मक्खी भी बैठ जाये. ये वे नेता हैं जिनके नाम से इलाके में चिराग जलते हैं. इन नेताओं की सवारी सडकों पर निकलती है तो आम लोग खड़े होकर काफिले में शामिल गाडियां गिनते हैं. इन महानुभाओं की तारीफ लिखने बैठ जाऊं तो शायद पूरा दिन कम पड़ जाये. लेकिन आश्चर्ये होता है कि ऊपर उल्लखित एक अदद मच्छर ने पूर्वांचल की शान के प्रतीक इन नेताओं को.........बना दिया है.



अब आप जरा इस विशेष मच्छर की विशेषता भी सुन लीजिये. उत्तरी एशिया और अफ्रीका के कुछ इलाकों में जन्मे ये मच्छर महोदय, हमारे यहाँ धान के खेतों में तेजी से अपनी वंशवृद्धि करते हैं. पालतू सूअर और जंगली पंछी जापानी 'बी' एनसेफ्लाईटिस वायरस के वाहक हैं. 'क्युलेक्स' मच्छर के पोते-परपोते जब इन्हें काटते हैं तो ये भी जापानी 'बी' एनसेफ्लाईटिस वायरस से भरे-पूरे हो जाते हैं. फिर जब ये मच्छर हमारे-आप जैसे किसी इंसान को काटते हैं तो हमें जापानी 'बी' एनसेफ्लाईटिस हो जाता है. जब ये मच्छर किसी बच्चे को काटता है तो एनसेफ्लाईटिस का वायरस और भी तेजी से असर डालता है. बीमारी के शुरूआती दौर में हल्का बुखार और हल्का सिरदर्द होता है. लेकिन बीमारी गंभीर होने के साथ ही बुखार की तीव्रता बढती जाती है. मरीज़ को तेज़ सिरदर्द के साथ झटके आते हैं. हालत बिगड़ने पर वो कोमा में भी जा सकता है. इस बीमारी के करीब ७० फीसदी मरीज़ मौत या विकलांगता के शिकार हो जाते हैं. जापानी 'बी' एनसेफ्लाईटिस वायरस मच्छर काटने के ५ से १५ दिनों के भीतर अपना असर दिखाता है. एशिया में यही वायरस, वायरल एनसेफ्लाईटिस का भी बडा कारण है. एशिया में हर साल इसके ३५ हज़ार से ५० हज़ार मामले सामने आते हैं. लेकिन आपको हैरानी होगी की अपने नागरिकों की जान की कीमत समझने वाले अमेरिका में इस बीमारी का साल भर में हद से हद सिर्फ एक मामला सामने आता है. वो भी सेना के उन जवानों में जो किसी वजह से एशिया की यात्रा करते हैं.

हमारे लिए दुर्भाग्य की एक बात ये भी है की इस बीमारी का अब तक कोई 'तय' इलाज नहीं है. सिर्फ कुछ सपोर्टिव दवाओं के सहारे मरीजों को बचाने की कोशिश की जाती है. ये बीमारी शहरी इलाकों में नहीं पाई जाती लिहाजा गाँव-देहात में रहने वाले इस बीमारी के सबसे बडे शिकार बनते हैं. भारत से पहले जिन देशों में इस महामारी ने सर्वाधिक तबाही मचाई है उनमें चाइना, कोरिया, जापान, ताइवान और थाईलैंड शामिल थे. लेकिन इन सभी देशों ने ब्यापक टीकाकरण के जरिये इस बीमारी पर काबू पा लिया. लेकिन अभी भी जो देश इस बीमारी की चपेट में रह गए हैं उनमें वियतनाम,कम्बोडिया, नेपाल, म्यामार, मलेशिया और भारत शामिल हैं. भारत में पूर्वांचल का इलाका इस बीमारी से सर्वाधिक पीड़ित है.

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