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शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

तो क्या सरकार झूठ बोलती है?




२३ जुलाई २००९ को उत्तर प्रदेश के चिकित्सा मंत्री अनंत मिश्रा एक अन्य मंत्री लालजी वर्मा और प्रमुख सचिव हरभजसिंह के साथ गोरखपुर पहुंचे। वहां मीडिया के सवालों का जबाब देते हुए इन मंत्रियों ने सीना चौड़ा करके बड़े शान से कहा था कि सरकार की कोशिशों के चलते उत्तर प्रदेश से जापानी एन्सेफ्लाईटिस का सफाया हो गया है। लेकिन अब बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज से आई एक रिपोर्ट ने इन मंत्रियों को झूठा साबित कर दिया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि इस साल अभी तक आए एन्सेफ्लाईटिस के २२७० मरीजों में से २८७ में जापानी एन्सेफलाईटिस की पुष्टि हुई है। गौरतलब है कि मेडिकल कॉलेज में अब तक ४१६ बच्चे जापानी और एक्यूट एन्सेफ्लाईटिस के चलते जान गवां चुके हैं।


एन्सेफ्लाईटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कम्पेनर डॉक्टर आर.एन.सिंह ने इस पूरे मामले को अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। डॉक्टर सिंह के मुताबिक सरकार ने अगर टीकाकरण में ईमानदारी बरती होती तो वाकई अभी तक जापानी एन्सेफलाईटिस का नामोनिशान मिट चुका होता। डॉक्टर सिंह शुरू से कहते आए हैं कि जापानी एन्सेफ्लाईटिस के टीके की कम से कम दो खुराक दी जाए तभी इसका सार्थक नतीजा मिल पायेगा। डॉक्टर सिंह आश्चर्य जताते हुए कहते हैं कि बार-बार चेताने के बावजूद सरकार ने टीकों की सिर्फ़ एक खुराक लगवाई। नतीजतन इतनी मुश्किल से शुरू हुआ टीकाकरण अभियान अपना मकसद पूरा नही कर सका। डॉक्टर सिंह के मुताबिक सरकार को तत्काल एन्सेफ्लाईटिस को नोटीफाईबल बीमारी घोषित करके एरिअल फोगिंग और सूअरबाड़ों को आबादी से दूर करने जैसे प्रभावी कदम उठाने चाहियें। इससे निश्चित ही जापानी एन्सेफ्लाईटिस पर काबू पाया जा सकता है। डॉक्टर सिंह के मुताबिक एस.ऐ १४-१४- २ नामक इस टीके की दूसरी खुराक न लगे तो पहली खुराक की प्रतिरोधक छमता सिर्फ़ ३३ फीसदी रह जाती है।


वैसे पूर्वांचल में एन्सेफलाईटिस के उन्मूलन को लेकर राज्य सरकार का रवैया पहले भी बेहद अफसोसजनक रहा है। सत्ता में आते ही माया सरकार ने एन्सेफ्लाईटिस से मरने वालों के परिज़नों के लिए २५ हज़ार और विकलांग होने वालों के लिए ५० हज़ार रुपयों के मुआवजे पर रोक लगा दी। ये मुआवजा पिछली मुलायम सरकार ने शुरू किया था। पिछली सरकार के निर्देशों और योजनाओं को ग़लत ठहराने के होड़ में माया सरकार को एन्सेफलाईटिस से प्रभावित गरीबोंकी स्थिति का जरा भी एहसास नहीं रहा। हर साल की तरह इस साल भी एन्सेफ्लाईटिस ने गोरखपुर और आसपास के जिलों में मौत बरपा रखी है लेकिन मुख्यमंत्री मायावती ने आज तक इस महत्वपूर्ण विषय पर एक शब्द नहीं बोला। डॉक्टर सिंह के मुताबिक समझ नहीं आता कि सूबे की मुख्यमंत्री इतने बड़े मुद्दे पर खामोशी कैसे अख्तियार कर सकती हैं। डॉक्टर सिंह ने गरीबों-दलितों के बीच घूमकर मिशन २०१२ कामयाब बनाने का मंसूबा संजोये राहुल गाँधी की कार्यशैली पर भी सवाल उठाया है। डॉक्टर सिंह के मुताबिक राहुल गाँधी और केन्द्र सरकार ने २००५ की महामारी के तुंरत बाद तो संवेदनशीलता दिखाई लेकिन लंबे समय से चुप्पी साधे बैठे हैं। केन्द्र सरकार अगर संवेदनशील होती तो एन्सेफ्लाईटिस के समूल नाश के लिए तत्काल एक रास्ट्रीय कार्यक्रम 'नीप' या किसी और नाम से लागू कर देती। डॉक्टर सिंह बारी-बारी सपा-भाजपा-बसपा और कांग्रेस सबकी पोल खोलते हैं। उनके शब्दों में,'साफ हो चुका कि किसी पार्टी या सरकार के असली एजेंडे में गरीब बच्चे और एन्सेफ्लाईटिस उन्मूलन नहीं है। इसलिए अब हम 'इस देश के वासी' ख़ुद एन्सेफलाईटिस उन्मूलन का बीडा उठा रहे हैं।' डॉक्टर सिंह ने गोरखपुर मंडल के तीन जिलों के तीन गावों को चुन कर वहां नीप के सभी सूत्रों को लागू करने का एलान किया है। इन गावों को नीप ग्राम का नाम दिया गया है। कुशीनगर और गोरखपुर की सीमा पर स्थित गांव होलिया सबसे पहले चिन्हित किया गया है।

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

सबसे बड़ा संपादक


सन २००५ की बात है. गोरखपुर में एन्सेफ्लाएटिस महामारी की शक्ल ले चुकी थी. मैं उन दिनों ईटीवी में  सीनिअर रिपोर्टर और गोरखपुर डीविजनल सेण्टर का इंचार्ज था. खबरनवीस होने के नाते एन्सेफ्लाएटिस को कवर करने के लिए मैं अपने कैमरामैन अखिलेश पाण्डेय  के साथ लगभग रोज़ मेडिकल कॉलेज के वार्ड नंबर ६० में जाया करता था. यों तो ये वार्ड बच्चों का है लेकिन जब एन्सेफ्लाएटिस मरीजों की तादात बढती है तो इसे एन्सेफ्लाएटिस वार्ड का नाम दे दिया जाता है. आजकल चूँकि पूरे साल एन्सेफलाएटिस के मरीज़ आते रहते हैं और जाहिर है इनमे से ज्यादातर बच्चे होते हैं इसलिए बच्चों के इस वार्ड को स्थाई तौर पर एन्सेफ्लाएटिस वार्ड का नाम दे दिया गया है.
इस वार्ड की तस्वीरें आज भी बिलकुल वैसी ही हैं जैसी तब थीं. एक-एक बिस्तर पर दो-दो, तीन-तीन बच्चे. आक्सीजन मास्क से ढंका उनका चेहरा. नसों में ढेरों सुइयां. उखड्ती सांसें, कराहती सिसकियाँ. वे अपनी टूटती आवाजों में  बामुश्किल,  'पापा.....वो......पापा......अम्मा......वो अम्मा.....बुदबुदाते हैं. मानो कह रहे हों कि 'ऐ पापा.....क्या तुम हमें इन सुइयों से भी नहीं बचा सकते?' 'अम्मा.....तुम्हारी छाती से लगकर अभी तो हमने दुनिया में जीने की पहली कोशिश ही की थी. क्या इतनी जल्दी तुम्हारा आँचल छूट जायेगा! क्या तुम कुछ भी नहीं कर सकती......माँ! अस्पताल के इस बिस्तर पर  तुम कैसे छोड़ जाओगी मुझे? वापस जाते वक्त...... मेरा निर्जीव शरीर, क्या समा पायेगा तुम्हारे आँचल में...... पापा! जिनकी उँगलियाँ पकड़कर मुझे चलना सीखना था.... क्या उनसे मेरी लाश उठाई जायेगी?'


उन मासूमों की आँखों में मुझे ऐसे ही ना जाने कितने सवाल नज़र आते थे. उन दिनों शायद ही कोई ऐसा दिन गुज़रा जब मैं और अखिलेश बिना अपनी आँखें नम किये वापस लौट पाए. तत्कालीन चिकित्सा मंत्री जयवीर सिंह के दौरे के वक्त, अपनी गोद में १२ साल के बच्चे की लाश उठाये सीढियों से उतरते  उस पिता का चेहरा, मुझे नहीं लगता कि रोज़ जाने

कितने चेहरे अपने कैमरे मैं कैद करने वाला अखिलेश भी भूल पाया होगा. उसकी चीखें आज भी याद आते ही मेरे कानों में गूंजने लगती हैं. मुझे याद है जयवीर सिंह के सामने  वो सीढियों पर लाश लिए बैठ गया था. उसके रुदन ने थोडी देर के लिए मंत्री और उनके पूरे अमले को वहीं ठिठक जाने पर मजबूर कर दिया था. फिर सब आगे बढ़ गये. उस अभागे पिता से मैंने पूछा 'तुम कहाँ के हो'.....पिता ने रोते हुए जबाब दिया 'पीपीगंज.....मिटटी ले जाने के लिए पैसा नहीं है.'  बिना कोशिश किये, मेरा हाथ अपनी जेब टटोलने लगा. मैंने अखिलेश से कैमरा आफ करने को कहा. जेब में सौ का एक नोट था जिसे उसके हवाले करके मैं आगे बढने लगा तो अचानक उसने पैर पकड़ लिए. मुझे उसकी आखों में बेटे के गम के साथ भयानक बेबसी के भावः भी नज़र आये. उस साल मेडिकल कॉलेज के वार्ड नंबर ६० को एक से बढ़कर एक हस्तियों के दीदार हुए. तत्कालीन राज्यपाल टी.वी.राजेस्वर, युवराज राहुल गाँधी, तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, सलमान खुर्शीद और जाने कौन-कौन.
इन्हीं हस्तियों में से तत्कालीन मुख्य सचिव नीरा यादव भी थीं. मेडिकल कॉलेज में उनका आना मुझे दो कारणों से भली-भांति याद है. हुआ यूँ कि नीरा यादव के आने से काफी पहले पुलिस और जिला प्रशासन के अधिकारियों ने गंभीर रूप से बीमार मरीजों को एक अलग वार्ड में छिपा दिया था. डर था कि कहीं श्रीमती यादव के सामने किसी बच्चे की मौत ना हो जाए. परिजनों को बाहर कर दिया गया था. कैमरों को मोटी-मोटी रस्सियों के उस पार और पत्रकारों को वार्ड के एक कोने में समेट कर प्रशासन ने अपनी तैयारी पूरी कर ली थी. नीरा यादव आईं. चेहरे पर संवेदना लाने की कोशिश करते हुए आगे बढीं. वार्ड में खासतौर से समझा-बुझाकर रोके गये साफ-सुथरे परिजनों और कुलीन डॉक्टरों से ना सुन सकने जितनी धीमी आवाज़ में बातें करती हुईं वे आगे बढ़ रही थीं. कैमरे धड़ाधड़ फ्लैश चमका रहे थे. पत्रकार भी उचक-उचक कर अपनी जिज्ञासा मिटा रहे थे. सब कुछ ठीक-ठाक ही था. इलेक्ट्रोनिक चैनल वालों की बाईट भी हो चुकी थी. कोई बखेडा ना खडा होने के चलते राहत महसूस कर रहे अधिकारी अब नीरा को विदा करने की तैयार में थे कि तभी उनका बना-बनाया खेल बिगड़ने लगा. छुपाकर रखे गये बगल के वार्ड में एक बच्ची की हालत अचानक बिगड़ गयी. इधर डॉक्टर बच्ची के सीने को पम्प कर रहे थे उधर उसके माँ-बाप का रो-रोकर बुरा हाल था. बच्ची की हर टूटती साँस के साथ उनका रोना बढता जा रहा था. अचानक उन्हें एहसास हुआ कि अब उनकी बच्ची नहीं बचेगी. इस एहसास ने उनके रुदन को चीखों में बदल दिया. लेकिन इससे पहले कि ये चीखें  नीरा यादव के कानो तक पहुँचती प्रशासन के हिमायती हाथों ने हलक में ही उन्हें रोक दिया. बिस्तर पर जिनकी बच्ची मर रही थी बगल में उन माँ-बाप के मुंह को कस कर दबाये अधिकारी उन्हें धमकाए जा रहे थे. अधिकारियों के इस पाप को मेरे कैमरामैन ने अपने कैमरे में कैद किया और हमने ईटीवी पर उसे दिखाया भी.
लेकिन उस वक्त मन में इसे खबर के रूप में दिखाने से ज्यादा ईश्वर में अपनी अटूट आस्था के खिलाफ एक विचार पनप रहा था. आखिर इस वार्ड में हर रोज़ मरते छोटे-छोटे मासूम बच्चों ने क्या पाप किया है, जिसकी सजा में ईश्वर इन्हें मौत बाँट रहा है? मैंने यही सवाल अपने पास खड़े हिंदुस्तान गोरखपुर के इंचार्ज और सीनिअर जर्नलिस्ट हर्षवर्धन शाही से किया? मेरे सवाल के जबाब में शाहीजी ने जो उत्तर दिया वो सही था या गलत, ये तो मैं तय नहीं कर पाया लेकिन आज तक मुझे उससे बेहतर संतावना नही सूझी. शाहीजी ने कहा,'' जैसे तुम कोई स्क्रिप्ट फाइनल करने से पहले जाने कितने शब्द लिखते और मिटा देते हो शायद ईश्वर भी ऐसा ही करता हो. आखिर इस संसार का सबसे बड़ा संपादक तो वही है ना!"
              Rahul_Gandhi_With_Patient_of_encephlaitis

आठ सौ में से सिर्फ सौ करोड खर्च करो, सूबे में मिट जायेगा एन्सेफलाएटिस: डॉक्टर आर.एन.सिंह

भ्रस्टाचार की शिकायतों के चलते काफी हील-हुज्ज़त हुई. लेकिन आखिरकार केन्द्र सरकार ने विश्र्वबैंक की वित्तीय मदद से प्रस्तावित यूपी हेल्थ सिस्टम डेवलपमेण्ट प्रोजेक्ट (यूपीएचएसडीपी)के दूसरे चरण को मंजूरी दे दी है। करीब 800 करोड़ रुपये लागत के इस प्रोजेक्ट पर विश्र्वबैंक पहले ही सैद्धान्तिक सहमति जता चुका है। उम्मीद है कि प्रोजेक्ट अगले वर्ष शुरू हो जाएगा।  केन्द्र सरकार की हरी झंडी के साथ ही प्रोजेक्ट की राह पूरी तरह प्रशस्त हो गई। अब जल्द ही विश्र्वबैंक के साथ इसके प्रारूप पर बातचीत शुरू होगी. सैद्धान्तिक तौर पर तय किया जा चुका है कि यूपीएचएसडीपी में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के सिर्फ वही क्षेत्र शामिल किये जाएंगे, जो नेशनल रूरल हेल्थ मिशन द्वारा आच्छादित नहीं हैं। लिहाज़ा एन्सेफलाएटिस उन्मूलन अभियान के चीफ काम्पेनर डॉक्टर ने मांग की है कि राज्य सरकार इस धनराशि में से सौ करोड रुपये खर्च करके एन्सेफलाएटिस उन्मूलन का प्रादेशिक कार्यक्रम 'रीप' लागू करा दे.
डॉक्टर सिंह के मुताबिक रीप कुछ और नहीं बल्कि नीप का ही प्रादेशिक स्वरुप होगा. उनके मुताबिक महज़ सौ करोड रुपयों में टीकाकरण, एरिअल फोग्गिंग, सूअरबाड़ों का नियंत्रण इत्यादि नीप में शामिल सभी प्रमुख बिन्दुओं का अनुपालन कर 'जापानी एन्सेफ्लाएटिस ' पर पूरी तरह से काबू पाया जा सकता है. यही नहीं 'कोक्सेकी' से होने एक्यूट एन्सफ्लाएटिस पर भी सूर्य की विकरित किरणों द्वारा पेयजल को शुद्ध कर काबू पाया जा सकता है. उल्लेखनीय है कि पिछले साल गोरखपुर पहुंची सी.डी.सी की टीम के सामने भी डॉक्टर सिंह पेयजल शुद्ध करने के अपने फार्मूले का प्रदर्शन कर चुके हैं. सी.डी.सी टीम में शामिल डॉक्टरों का रुख इस फार्मूले को लेकर काफी उत्साहित करने वाला था. उनके मुताबिक भारत जैसे विकासशील देश में ये फार्मूला गरीब तबकों की शुद्ध पेयजल तक पहुँच को आसान बना सकता. जो काम आज़ादी के ६२ वर्षों तक सरकारें नहीं कर पायीं वो सूर्य की किरणों के सही इस्तेमाल से हो सकता है. इसी कांसेप्ट पर मेलबर्न की एक यूनिवरसिटी में में शोध भी चल रहा है. डॉक्टर सिंह के मुताबिक कोई तकनीक विदेश से चल कर आये इससे पहले हमारी सरकार को ये देसी फार्मूला गाँव-गाँव तक लोकप्रिय बना देना चाहिए.
बहरहाल, बात करते हैं विश्व बैंक की उस सहायता की जिसके तहत राज्य सरकार को आठ सौ करोड रुपये मिलने हैं. अबकी इस योजना में नीतिगत सुधारों पर खासा जोर दिये जाने की सम्भावना है। प्रोजेक्ट की तैयारी से जुड़े एक अधिकारी के मुताबिक दूसरे चरण में नर्सिग व पैरा मेडिकल मानव संसाधन विकास, आयुष प्रशिक्षण, प्रोग्राम मैनेजमेण्ट प्रशिक्षण, मानकों के अनुरूप अस्पतालों का सुदृढ़ीकरण, खाद्य एवं औषधि प्रशासन का विकास, उपार्जन प्रणाली में सुधार तथा एक डेटा रिसोर्स सेन्टर जैसे क्षेत्र शामिल किये जाने का प्रस्ताव है। प्रोजेक्ट के संचालन में जहां सम्भव होगा, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का भी इस्तेमाल किया जाएगा। ज्ञातव्य है कि यूपीएचएसडीपी का 478.08 करोड़ रुपये (109.65 मिलियन यूएस डालर) लागत का पहला चरण जुलाई, 2000 में 28 चुनिन्दा जिलों में शुरू हुआ था, लेकिन निर्धारित अवधि दिसम्बर, 05 तक पूरी धनराशि व्यय न हो पाने के कारण प्रोजेक्ट को दिसम्बर, 08 तक खींचा गया। राज्य सरकार जनवरी, 09 में प्रोजेक्ट का दूसरा चरण शुरू करना चाहती थी। इसके लिए 800 करोड़ रुपये लागत का प्रस्ताव विश्र्वबैंक के सामने पेश भी किया जा चुका था किन्तु इसी बीच केन्द्र व राज्य सरकार की कार्यशैली से नाखुश विश्र्वबैंक ने प्रोजेक्ट के दूसरे चरण को मंजूरी देने से मना कर दिया था। बहरहाल, प्रदेश शासन के अधिकारियों ने हथियार नहीं डाले। उनके प्रयास से गत जनवरी में दिल्ली में केन्द्र सरकार के उच्चाधिकारियों के साथ बैठक आयोजित की गई, जिसमें राज्य सरकार को कई नयी शर्तो व बन्दिशों के साथ नया प्रोजेक्ट तैयार करने का निर्देश दिया गया। अन्तत: अधिकारियों की कवायद रंग लायी और अब केन्द्र सरकार की मंजूरी मिल जाने के बाद अगले वर्ष पूर्वा‌र्द्ध में ही प्रोजेक्ट का दूसरा चरण शुरू हो जाने की उम्मीद नजर आने लगी है।

छपाक की चिंता फिलहाल टली


छपाक ने दो दिन पहले गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में रुपयों की कमी के चलते इन्सेफेलाइटिस पीडितों के इलाज में आ रही दिक्कतों का खुलासा किया था. छपाक ने बताया था कि अगर हालत नहीं सुधरी तो स्थिति विस्फोटक हो सकती है. इस मुद्दे को  इन्सेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कम्पेनर डॉक्टर आर.एन.सिंह ने भी जोर-शोर से उठाया था. उन्होंने सरकार को आग से ना खेलने की चेतावनी देते हुए अपने आन्दोलन को इलाज़ के स्तर तक ले जाने का ऐलान किया था. उल्लेखनीय है की अभी तक  इन्सेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के लोग इलाज़ के स्तर पर सरकार की भूमिका से संतुष्ट रहे हैं. उनकी मांग इन्सेफेलाइटिस उन्मूलन के लिए समग्र योजना 'रास्ट्रीय इन्सेफेलाइटिस उन्मूलन कार्यक्रम-नीप' लागू करने की है. लेकिन अब उनका गुस्सा इलाज़ के मुद्दे पर भी साफ नज़र आने लगा है. डॉक्टर सिंह के शब्दों में,' नीप लागू करने या करवाने में नाकाम राज्य और केंद्र की सरकारें अब इलाज़ के स्तर पर भी नाकाम साबित होने लगी हैं. सरकार चलाने वाले शायद भूल गये हैं कि जनता ही है जो सरकारों को जनती है. सरकार ने लोगों की आँखों में सिर्फ आंसू दिए हैं. कहीं ऐसा ना हो की ये सरकारें जनता के इन्हीं आंसुओं में बह और ढह जाएँ.'  स्थानीय मीडिया ने भी इस खबर को संजीदगी से उठाया. नतीजा ये हुआ कि  शासन ने दवाओं के लिये ना सिर्फ पचास लाख रुपयों की मंजूरी दे दी है बल्कि दो करोड़ रुपये और देने का मन बनाया है. शासन


इस कार्यवाही के चलते मेडिकल कालेज में भर्ती  इन्सेफेलाइटिस मरीजों के लिये दवाओं का संकट फिलहाल टल गया है। इन्सेफेलाइटिस के ढाई सौ से अधिक मरीजों के लिये दवाओं का बजट खत्म होने से परेशान कालेज के प्रधानाचार्य डा. राकेश सक्सेना इसके लिये बुधवार को लखनऊ पहुंचे थे। डा. सक्सेना अपने साथ दवाओं के बजट के लिये दो प्रस्ताव ले गये थे जिसमें एक दो करोड़ का था जबकि दूसरा पचास लाख का था।  प्रधानाचार्य डा. सक्सेना के अनुसार शासन ने मामले को गम्भीरता से लेते हुए फिलहाल पचास लाख रुपये की मंजूरी दे दी है और इसको जारी करने की प्रक्रिया चल रही है। उम्मीद है कि दो करोड़ रुपये का प्रस्ताव भी जल्द ही मंजूर हो जायेगा और यह धनराशि मिल जायेगी।
मेडिकल कालेज में भर्ती इन्सेफेलाइटिस के ढाई सौ तथा अन्य मरीजों पर होने वाले खर्च को देखते हुए अब दवाओं का बजट काफी कम बचा है। अप्रैल 2008 में शासन ने मेडिकल कालेज को दवाओं के मद में दो करोड़ रुपये दिये थे। लेकिन अगस्त महीने से कालेज के इन्सेफेलाइटिस समेत अन्य मरीजों की भीड़ बढ़ने से दवाओं, रसायनों व आक्सीजन इत्यादि पर होने वाला खर्च काफी बढ़ गया था। पिछले एक हफ्ते से इन्सेफेलाइटिस के मरीजों की तादाद बढ़ने से यह सिर्फ इन्सेफेलाइटिस मरीजों पर रोजाना दो लाख रुपये का खर्च आने लगा है। नेहरू अस्पताल में भर्ती अन्य मरीजों को मिलाकर यह खर्च रोजाना लगभग ढाई लाख रुपये तक पहुंच गया है।

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

गाँधी बेमिसाल हैं


इतिहास के जिस कालखंड में गाँधी हुए वो पूरी दुनिया में मानवता की बड़ी त्रासदियों के लिए याद किया जाता है. हिटलर उसी दौर में यहूदियों को उनके बच्चों समेत गैस चेम्बरों में भिजवा रहा था तो मित्र राष्ट्रों ने शक्ति संतुलन के लिए पूरी दुनिया को विश्व युद्घ के हवाले कर दिया था. हेरोशिमा और नागासाकी पर उसी दौर में अमेरिका ने एटोमिक विस्फोट किये थे. सत्ता और संसाधनों की जंग ने पूरी दुनिया को बर्बादी और इंसानियत को शर्मनाक कुकृत्यों के हवाले कर दिया था. ऐसे दौर में गाँधीजी ने सत्य और अहिंसा को अपना हथियार बनाया. गांधीजी कहते हैं, ' मुझे दुनिया को कोई नयी चीज नहीं सिखानी है. सत्य और अहिंसा के सिद्धांत हमेशा से हैं.' सही है ....तथागत और महावीर ने दुनिया को सत्य और अहिंसा का ही रास्ता बताया था. हिन्दू धर्म के ग्रन्थ भी इसी सिधान्त की बात करते हैं. लेकिन गाँधीजी के पहले सत्य और अहिंसा को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर दुनिया में कहीं भी जंग नहीं  लड़ी गयी थी. भारत में भी क्रांतिकारियों के अलावा उनके बहुत से साथियों को भी इन हथियारों की बदौलत मुक्कमल कामयाबी मिलने पर यकीन नहीं था. चौरी-चौरा कांड के बाद भारत छोडो आन्दोलन स्थगित करने के फैसले का खुद नेहरु तक ने विरोध किया था. लेकिन गाँधी तो गाँधी थे. अपने शत्रु के लिए भी दिल में कोई मैल नहीं रखना उन जैसा कौन सीख पाया. गाँधीजी ने अपने इन हथियारों के जरिये ना केवल आज़ादी हासिल की बल्कि पूरी दुनिया को एक नया रास्ता भी दिखा दिया. गाँधी जी ने कहा था,'अगर सत्य और अहिंसा से भारत को आज़ादी मिली तो फिर दुनिया के दूसरे गुलाम देश भी इसका अनुसरण करेंगे.' गांधीजी की बात बाद में नेल्सन मंडेला के आन्दोलन की सफलता और ब्रिटिश उपनिवेशों में आज़ादी की बयार से सच साबित हुई. आज भी बहुत से लोग मानते हैं कि गाँधी जी की चली होती तो भारत पाकिस्तान का बंटवारा ना हुआ होता. इश्वर- अल्लाह के नाम पर यों मारकाट ना मची होती. कहते हैं, महान आत्माएं काम पूरा हो जाने के बाद दुनिया में नहीं रहतीं. गाँधीजी भी नहीं रहे. लेकिन सबसे बडे दुःख की बात ये है कि उनकी विरासत सँभालने की जिम्मेदारी उनके बाद किसी ने नहीं उठाई. उन्होंने तो कतई नहीं... जिन्होंने सालों-साल उनके नाम पर राज किया और आज भी उनके नाम का बेजा इस्तेमाल करने में जिन्हें जरा भी शर्म नहीं आती.     

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

एम.सी.आई आग से ना खेले

  
फोटो: मारकंडे मणि त्रिपाठी   
मेरे शहर गोरखपुर को टी.वी चैनलों ने आजकल रामभरोसे बताना शुरू कर दिया है. वाकई! हालात ही ऐसे हैं. ३२ सालों में जो एन्सेफलाईटिस हजारों बच्चों की जान ले चुकी है. इस साल अब तक ३०२ बच्चे उसकी भेंट चढ़ चुके. सबको मालूम है कि गोरखपुर मेडिकल कॉलेज ही वो जगह है जहाँ पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल के हजारों एन्सेफलाईटिस पीडितों का सबसे सस्ता इलाज़ होता है. दूसरी बिमारियों के लिए भी ये जगह गरीबों की उम्मीदों का अकेला सहारा है. लेकिन गाजियाबाद और नॉएडा जैसे शहरों में कई नाकाबिल निजी मेडिकल कालेजों को भी मान्यता देने वाली एम.सी.आई जब-तब गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की मान्यता पर सवाल उठाती रहती है. यहाँ की स्नातकोत्तर मान्यता वो पहले ही रद्द कर चुकी है. हाल में एम.सी.आई ने मान्यता रद्द करने की धमकी फिर दी है. एम.सी.आई को अगर क्वालिटी एजूकेशन की इतनी ही परवाह है तो वो मानकों की सख्ती निजी मेडिकल कालेजों में क्यों नहीं करती?
यहाँ उत्त्तर प्रदेश सरकार के लिए भी एक सवाल है कि जब एम.सी.आई एक नहीं कई बार मानकों का सवाल उठा चुकी है तो फिर मानकों का अनुपालन क्यों नहीं कराया जाता. क्या पूर्वांचल के गरीबों के इलाज की सबसे मुफीद जगह को बचाने के लिए सरकार के पास कुछ करोड भी नहीं हैं? जो भी हो ये तय है की अगर पूर्वांचल के इस संस्थान पर संकट आया तो पूर्वांचल के लोग इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे.  एन्सेफलाईटिस उन्मूलन की मांग को लेकर लोग पहले ही आंदोलनरत हैं. इस साल सरकार ने एन्सेफलाईटिस पीडितों की दवाओं के लिए मेडिकल कॉलेज को २ करोड रुपये दिए थे जो ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुए. मेडिकल कॉलेज में एन्सेफलाईटिस पीडितों का इलाज मुश्किल में पड़ा हुआ है. मान्यता का नया संकट कहीं चिकित्सा विद्यार्थियों  को विचलित ना कर दे. अगर ऐसा हुआ तो इलाज और मुश्किल हो जायेगा. एन्सेफलईटिस उन्मूलन अभियान चला रहे डॉक्टर आर.एन.सिंह कहते हैं, 'उनका आन्दोलन इलाज से ज्यादा समस्या के स्थाई समाधान पर जोर देता है'. लेकिन मान्यता का सवाल और इलाज के लिए धन की कमी, ज़ाहिर है! उनके लिए भी कुछ नये मोर्चे खोल रही है.

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भारत मैं नक्सल समस्या का समाधान कैसे होगा

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