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बुधवार, 30 सितंबर 2009

हल्ला बोल


चलो ऐसा करें कि एक साजिश रचें
बिछा के बारूदी सुरंगें
उड़ा दें
ये चुप्पी की दुनिया

बीड़ी जलईले जिगर से पिया, जिगर में बड़ी आग है. सुनिधि चौहान का ये गाना पिछले साल बडा मशहूर हुआ. लेकिन पिछले ही साल एक फिल्म आई 'हल्ला बोल' जो अजय देवगन और पंकज कपूर के जबरदस्त अभिनय के बावजूद बहुत सफल नही हो सकी. इस फिल्म में एक बडे फिल्म कलाकार को सड़क पर उतरकर भ्रष्ट राजनीति से लोहा लेते दिखाया गया था. लेकिन लोगों ने परदे पर संघर्ष के बजाये जिगर की आग से बीड़ी जलाना ज्यादा
पसंद किया.
खैर! ये सिर्फ परदे की बात नहीं. असल दुनिया में ऐसा रोज़ हो रहा है. भूख, अन्नाय और बेरोज़गारी बढ़ रही है लेकिन देश का नौज़वान संघर्ष के बजाये अपने जिगर की आग का इस्तेमाल बीड़ी जलाने के लिए कर रहा है. आखिर भगत सिंह और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के इस देश में आज की नौजवान पीढी को हुआ क्या है. आर्थिक उदारीकरण के फलस्वरूप देश के हजारों नौजवानों को नए अवसर मिले इसमें कोई शक नहीं. लेकिन जिस देश में तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती हो उस देश के नौज़वानों को क्या अपने जिगर की आग का ऐसा इस्तेमाल करना शोभा देता है. पॉँच सितारा जिन्दगी जीने वालों की नक़ल करके आखिर हम कब तक देश की असल तस्वीर से मुंह छिपाते रहेंगे. 'जो भी हो हमारी बला से' वाली धारणा कब तक हमारे कम आयेगी. आइये हम 'छपाक' से अपनी जिम्मेदारी का एहसास करें और दुनिया को बता दें कि हम अब  इस पानी को और सड़ने नहीं देंगे. 'छपाक' एक
आह्वान है, भूख, गरीबी, बीमारी, अत्याचार और भ्रष्टचार से लड़ने के लिए. हाँथ बढाइये........आप चुप तो बहुत रह चुके.        

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