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रविवार, 15 अगस्त 2010

दुखी मन मेरे मन मेरा कहना जहाँ नहीं चैना वहां........

अजय कुमार सिंह
अंग्रेजों के भारत से चले जाने के ६३ साल बाद एक बार फिर हमे हर तरफ वही घिसी-पिटी तकरीरें सुनने-पढ़ने को मिल रही हैं. वही पुराने शीर्षक 'हम कितने आज़ाद हुए.......',  'सच्ची आज़ादी कब मिलेगी.....', 'आज़ादी के मायने.....' 'क्या हम सचमुच आज़ाद हैं.....?' घुमा फिर कर हर लेख में यही बात है कि हमारे महापुरुषों ने जिस मकसद से आजादी हासिल की थी वो पूरा नहीं हुआ.
बड़ी दिक्कत है भाई. मैं बड़ा कन्फ्यूज़ हूँ. अभी पिछले साल जब चीन ने अपना ६० वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया तो हमारी आँखें फटी रह गईं. हमारे टीवी चैनलों ने तो चीनी सेना और भारतीय सेना की जोरशोर से तुलना भी शुरू कर दी. सबसे ज्यादा बुरा तो यह लगा कि कुछ चैनलों ने चीनी सेना को हमारी सेना से दुगुना ताकतवर बताते हुए यह कहना शुरू कर दिया कि अगर युद्ध हुआ तो हमारी सेना अमेरिका की सेना के साथ मिलकर चीनी सेना के छक्के छुड़ा देगी. हालांकि नवम्बर २००९ में चीन के तीन दिवसीय दौरे पर गये ओबामा ने कश्मीर के मसले में चीन को पंचायत का स्कोप देकर कई भ्रम मिटा दिए.
हम हिन्दुस्तानी पता नहीं किस सपने रहते हैं. ये होना चाहिए. ये होगा तो ये हो जायेगा. पता नहीं क्या-क्या सोचते रहते हैं. बस करते उतना ही हैं जितने से अपना काम चल जाए. अब देखिये ना! १५ अगस्त आया नहीं कि एक से एक वक्तव्य आने लगे. कोई फर्जी उपलब्धियों का बखान कर रहा है तो कोई सबको कुंठित करने में जुटा है. जबकि दोनों ही अच्छी तरह जानते हैं उन्हें देश से कोई लेना-देना नहीं है. बस! कुछ बोलना है, लिखना है सो कोरम पूरा कर दिया.
बड़ी बिनम्रता से मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि देश के बारे में आप जब भी कुछ अच्छा या कड़वा सच बोलें तो याद रखें कि सिर्फ बयानबाज़ी या लेखन से किसी देश के हालात नहीं बदला करते. यदि आप वाकई हालात बदलने के लिए गंभीर हैं तो फिर आपको ईमानदार  कोशिश करनी होगी.यह कहने से काम नहीं चलेगा कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. या तो आप कुछ करके बदलाव की नीव डालिए या फिर चुप रहिये. अगर ये दोनों नहीं कर सकते और वाकई हालात से दुखी हैं तो फिर फंटूश फिल्म में किशोर कुमार द्वारा गया वो गाना याद कीजिये......दुखी मन मेरे मन मेरा कहना......जहाँ नहीं चैना वहां नहीं रहना!
 

रविवार, 8 अगस्त 2010

दुधारू की दुल्लती

अरसे से जलयुक्त दूध का रसास्वादन करने के बाद आजकल मेरे घर वालों पर शुद्ध दूध मंगाने का शौक सवार हुआ है. जाहिर है इस कष्टप्रद काम को अमली जामा पहनाने के लिए मैं सबसे उपयुक्त माना गया हूँ. नतीजतन पिछले एक हफ्ते से सुबह पॉँच बजे ही बिस्तर से उठा दिया जाता हूँ. चाहूं- ना चाहूं क्या फर्क पड़ता है. दूध की बाल्टी लेकर उनीदीं आखों को मलते ग्वाले के घर पहुंचना ही पड़ता है. आजकल रोज़ सुबह शुरुआत ऐसे ही होती है. आज सुबह ग्वाले के घर पहुंचा तो वो गाय के दोनों पैरों को बांधने में जुटा था. इस गाय ने १४ रोज़ पहले एक बछड़े को जन्म दिया है. थोड़ी देर में बछड़ा छोड़ा जाता है. खूंटे से छूटते ही बछड़ा दौड़ कर गाय के थन के पास पहुँचता है और जोर-जोर से मुंह मारते हुए दूध पीना शुरू कर देता है. उधर गाय बछड़े का शरीर चाट रही होती है. वात्सल्य का कैसा प्यारा दृश्य था. बामुश्किल ३० सेकेण्ड गुजरे होंगे. तभी ग्वाले ने गले में बंधी रस्सी से बछड़े को खींच लिया. पता नहीं क्यों मुझे बहुत बुरा लगा. मन में सोचने लगा इंसान कितना स्वार्थी है.....मैं अभी इस विचार से जूझ ही रहा था कि बछड़े ने रस्सी तुड़ाने की कोशिश की लेकिन ग्वाले ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. अलबत्ता बछड़े की इस हरकत से ग्वाला को गुस्सा आ गया और उसने बछड़े की पीठ पर दो हाँथ जमा दिए. १४ दिन के बछड़े की पिटाई! देखी ना गई. मुंह से अनायास ही निकल पड़ा. उन्हह..उन्हह....मारो नहीं...! बछड़े को बांध अब ग्वाला गाय को दुहने में जुट गया. गाय की दोनों आँखों से आंसुओं की दो धार निकलती साफ़ नज़र आ रही थीं. मानो अपने नवजात के साथ हो रही ज्यादती का दर्द आँखों से छलक आया हो लेकिन बेफिक्र ग्वाला उस बेचारी गाय के थन से दूध निकालने में जुटा था. अपने काम में ग्वाला इस कदर लीन था कि उसे एहसास ही नहीं रहा कि कब गाय के पैरों में बंधी रस्सी ढीली पड़ गई. ग्वाला दूध दुहता रहा और गाय के पैरों से लगायत पूरे शरीर पर बैठे मच्छर उसे डसते रहे. इसी बीच कसमसाती गाय ने ग्वाले को एक दुल्लती मारी. ग्वाला पीछे पीठ के बल गिरा लेकिन बाल्टी उसके हाँथ में ही रही. उसने दूध को गिरने से बचा लिया था. थोड़ी देर पहले ग्वाले का गुस्सा देख चुका मैं सोच रहा था कि ग्वाला अब गाय पर टूट पड़ेगा. पर! ये क्या? ग्वाले पर तो जैसे गाय की दुलत्ती का कोई असर ही नहीं हुआ. वो मुस्कुराते हुए उठा. गाय के पैरों में दुबारा रस्सी बांधी और दूध दुहने में जुट गया. मैंने सुना बहुत था आज देख भी लिया, ऐसी होती है दुधारू की दुल्लती.        

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

व्यक्ति से बड़ा परिवार 
परिवार से बड़ा समाज
समाज से बड़ा देश  
देशहित में अपना परिचय पत्र दिखाएँ 
यह जरूरी है. 

सोमवार, 12 जुलाई 2010




                         

मंगलवार, 4 मई 2010

गुरूजी से क्या भूल हुई!



सत्येंद्र श्रीवास्तव, वाराणसी रौनाखुर्द, बेला (चोलापुर) निवासी लौटन प्रसाद वर्मा को दोनों पैरों में जंजीर बांधकर रखा जा रहा है। वह महज पांच साल पहले सहायक अध्यापक थे। बच्चों को ककहरा पढ़ाते थे। अब चारपाई की बाध (रस्सी) गिन रहे हैं। उन्हें अंग्रेजी की वर्णमाला भी नहीं भूली है। इसकी तस्दीक गांव-गिरांव के बच्चे करते हैं। इन बच्चों को ही तो देखकर उनके मुंह से ए, बी, सी, डी..निकलने लगता है। यह सब उस दौर में हो रहा है जब मानवाधिकार के नाम पर खड़े हुए हौवे ने पुलिस मुठभेड़ों में भारी कमी ला दी है। परिवारों के मसले में मानवाधिकार का सवाल खड़ा होने लगा है। ऐसे दौर में लौटन प्रसाद वर्मा के साथ ऐसा अमानवीय बर्ताव चौंकानेवाला है। खास यह कि इस ओर नजर डालने की जहमत भी किसी झंडाबरदार ने नहीं उठाई है। बावजूद इसके कि लौटन प्रसाद को जंजीर लगाने वाले परिजन इस मसले को खुद बार-बार प्रशासन के पास ले जाते रहे हैं। फिर भी लौटन प्रसाद की दशा में सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही है। दरअसल, लौटन प्रसाद के पागल हो जाने के पीछे भी एक कहानी है और इसके सूत्रधारों की कारस्तानियों ने एक हंसते-खेलते परिवार को बदहाल कर दिया है। लौटन प्रसाद के परिवार में पांच बेटियां और एक बेटा है। तीन बेटियों की शादी हो चुकी है। दो युवा बेटियों की शादी की चिंता उनकी पत्नी शांति देवी को खाए जा रही है। इनकी (पति) हालत ठीक होती तो कोई बात नहीं थी। इन्हें तो इनके साथियों ने ही पागल कर दिया। उनका बेटा संतोष बीकॉम पास है। वह पिता के पागलपन को एक साजिश बताता है। संतोष का साफ कहना है कि श्री विश्वकर्मा पूर्व माध्यमिक विद्यालय, रौनाखुर्द में उसके पिता लौटन प्रसाद वर्मा 6 दिसंबर 1977 को बतौर सहायक अध्यापक तैनात हुए। आगे चलकर प्रबंधन से जुड़े कतिपय लोगों के मन में लालच आ गया। किसी चहेते की नियुक्ति के लिए तानाबाना बुना गया। पिताजी पर अत्याचार शुरू हो गए। प्राचार्य के सामने साथी अध्यापकों ने जूता तक साफ कराया। फिर भी प्रबंधन की ओर से ऐसा करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इन बातों का लौटन प्रसाद के दिमाग पर गहरा असर हो गया। वह लोगों से नजरें चुराने लगे। इसकी तस्दीक उनसे मिलकर ही हो जाती है। मिलते ही वह अपने चेहरे को हाथों से ढंकने की कोशिश करते हैं। पूछने पर सिर्फ अपना नाम बताते हैं। दूसरे सवाल छिड़ते ही उनकी बेचैनी बढ़ जाती है। परिजन कहते हैं-पहले ऐसे नहीं थे। शायद विद्यालय में हुए सार्वजनिक अपमान की वजह से ही उनमें मनोरोग के लक्षण उभरने लगे। 1 नवंबर 2004 से 15 सितंबर 2005 तक इलाज भी कराया गया। इलाज के दौरान लौटन प्रसाद वर्मा विद्यालय में अनियमित हो गए थे। इसका बाकायदा सरकारी डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट दिया गया। फिर भी विद्यालय प्रबंधन ने उन पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का दबाव बनाना शुरू कर दिया। उनकी बीए पास बेटी कुसुम कहती है-पिताजी को वर्ष 2009 में रिटायर होना था लेकिन उनसे 2006 में वीआरएस पर दस्तखत करा लिया गया। इसके बाद पिताजी की हालत बिगड़ती चली गई। एक स्थिति ये आई कि वह इधर-उधर भागने-दौड़ने लगे।
इस स्थिति में लौटन प्रसाद के साथ कोई अनहोनी न हो जाए इससे बचने के लिए घर में चारपाई पर दोनों पैरों में जंजीर बांधकर रखा जाता है। सुधबुध खो चुके लौटन प्रसाद अपनी बेबस आंखों से अपनी बगिया को बदहाल देख रहे हैं। इनकी स्थिति पर तरस खाने की बजाय विद्यालय प्रबंधन ने उनके सेवानिवृत्ति के बाद के पावने रिलीज कराने में रुचि नहीं ले रहा है। इतना ही नहीं परिवार पर लगातार इस बात के लिए दबाव बनाया जा रहा है कि वीआरएस डेट 2004 कर दी जाए। लौटन प्रसाद वर्मा की पेंशन-ग्रेच्युटी तक का भुगतान नहीं हो रहा है। खास बात यह कि इसकी शिकायत शिक्षा विभाग ही नहीं कलेक्टर तक से की जा चुकी है। फिर भी सुनवाई नहीं हो रही है। पत्नी शांति देवी कहती हैं-बेटियों की शादी हो जाए, घर चली जाएं तब कोई ंिचंता नहीं रहेगी। बेटे-बहू कहीं और रह लेंगे। तब कम से कम पैरों से जंजीर खोलने की बात तो सोच सकतेसत्येंद्र श्रीवास्तव, वाराणसी रौनाखुर्द, बेला (चोलापुर) निवासी लौटन प्रसाद वर्मा को दोनों पैरों में जंजीर बांधकर रखा जा रहा है। वह महज पांच साल पहले सहायक अध्यापक थे। बच्चों को ककहरा पढ़ाते थे। अब चारपाई की बाध (रस्सी) गिन रहे हैं। उन्हें अंग्रेजी की वर्णमाला भी नहीं भूली है। इसकी तस्दीक गांव-गिरांव के बच्चे करते हैं। इन बच्चों को ही तो देखकर उनके मुंह से ए, बी, सी, डी..निकलने लगता है। यह सब उस दौर में हो रहा है जब मानवाधिकार के नाम पर खड़े हुए हौवे ने पुलिस मुठभेड़ों में भारी कमी ला दी है। परिवारों के मसले में मानवाधिकार का सवाल खड़ा होने लगा है। ऐसे दौर में लौटन प्रसाद वर्मा के साथ ऐसा अमानवीय बर्ताव चौंकानेवाला है। खास यह कि इस ओर नजर डालने की जहमत भी किसी झंडाबरदार ने नहीं उठाई है। बावजूद इसके कि लौटन प्रसाद को जंजीर लगाने वाले परिजन इस मसले को खुद बार-बार प्रशासन के पास ले जाते रहे हैं। फिर भी लौटन प्रसाद की दशा में सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही है। दरअसल, लौटन प्रसाद के पागल हो जाने के पीछे भी एक कहानी है और इसके सूत्रधारों की कारस्तानियों ने एक हंसते-खेलते परिवार को बदहाल कर दिया है। लौटन प्रसाद के परिवार में पांच बेटियां और एक बेटा है। तीन बेटियों की शादी हो चुकी है। दो युवा बेटियों की शादी की चिंता उनकी पत्नी शांति देवी को खाए जा रही है। इनकी (पति) हालत ठीक होती तो कोई बात नहीं थी। इन्हें तो इनके साथियों ने ही पागल कर दिया। उनका बेटा संतोष बीकॉम पास है। वह पिता के पागलपन को एक साजिश बताता है। संतोष का साफ कहना है कि श्री विश्वकर्मा पूर्व माध्यमिक विद्यालय, रौनाखुर्द में उसके पिता लौटन प्रसाद वर्मा 6 दिसंबर 1977 को बतौर सहायक अध्यापक तैनात हुए। आगे चलकर प्रबंधन से जुड़े कतिपय लोगों के मन में लालच आ गया। किसी चहेते की नियुक्ति के लिए तानाबाना बुना गया। पिताजी पर अत्याचार शुरू हो गए। प्राचार्य के सामने साथी अध्यापकों ने जूता तक साफ कराया। फिर भी प्रबंधन की ओर से ऐसा करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इन बातों का लौटन प्रसाद के दिमाग पर गहरा असर हो गया। वह लोगों से नजरें चुराने लगे। इसकी तस्दीक उनसे मिलकर ही हो जाती है। मिलते ही वह अपने चेहरे को हाथों से ढंकने की कोशिश करते हैं। पूछने पर सिर्फ अपना नाम बताते हैं। दूसरे सवाल छिड़ते ही उनकी बेचैनी बढ़ जाती है। परिजन कहते हैं-पहले ऐसे नहीं थे। शायद विद्यालय में हुए सार्वजनिक अपमान की वजह से ही उनमें मनोरोग के लक्षण उभरने लगे। 1 नवंबर 2004 से 15 सितंबर 2005 तक इलाज भी कराया गया। इलाज के दौरान लौटन प्रसाद वर्मा विद्यालय में अनियमित हो गए थे। इसका बाकायदा सरकारी डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट दिया गया। फिर भी विद्यालय प्रबंधन ने उन पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का दबाव बनाना शुरू कर दिया। उनकी बीए पास बेटी कुसुम कहती है-पिताजी को वर्ष 2009 में रिटायर होना था लेकिन उनसे 2006 में वीआरएस पर दस्तखत करा लिया गया। इसके बाद पिताजी की हालत बिगड़ती चली गई। एक स्थिति ये आई कि वह इधर-उधर भागने-दौड़ने लगे। इस स्थिति में लौटन प्रसाद के साथ कोई अनहोनी न हो जाए इससे बचने के लिए घर में चारपाई पर दोनों पैरों में जंजीर बांधकर रखा जाता है। सुधबुध खो चुके लौटन प्रसाद अपनी बेबस आंखों से अपनी बगिया को बदहाल देख रहे हैं। इनकी स्थिति पर तरस खाने की बजाय विद्यालय प्रबंधन ने उनके सेवानिवृत्ति के बाद के पावने रिलीज कराने में रुचि नहीं ले रहा है। इतना ही नहीं परिवार पर लगातार इस बात के लिए दबाव बनाया जा रहा है कि वीआरएस डेट 2004 कर दी जाए। लौटन प्रसाद वर्मा की पेंशन-ग्रेच्युटी तक का भुगतान नहीं हो रहा है। खास बात यह कि इसकी शिकायत शिक्षा विभाग ही नहीं कलेक्टर तक से की जा चुकी है। फिर भी सुनवाई नहीं हो रही है। पत्नी शांति देवी कहती हैं-बेटियों की शादी हो जाए, घर चली जाएं तब कोई ंिचंता नहीं रहेगी। बेटे-बहू कहीं और रह लेंगे। तब कम से कम पैरों से जंजीर खोलने की बात तो सोच सकते! 

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

ब्रेकिंग न्यूज़! पूर्व डी.एस.पी शैलेन्द्र प्रताप छोड़ेंगे कांग्रेस

अजय कुमार सिंह
एस.टी.एफ डी.एस.पी की नौकरी छोड़कर राजनीति में दांव आजमाने वाले शैलेन्द्र प्रताप सिंह ने अब कांग्रेस छोड़ने का मन बना लिया है. शैलेन्द्र, कांग्रेस में अपराधियों की घुसपैठ से नाराज़ हैं. विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि शैलेन्द्र एक -दो रोज़ में कांग्रेस छोड़ने का एलान कर सकते हैं.
गौरतलब है कि कांग्रेस में शैलेन्द्र, सूचना का अधिकार टास्क फोर्स  के बतौर प्रमुख काम करते हैं. पिछले तीन सालों से शैलेन्द्र इस टास्क फ़ोर्स के जरिये मायावती सरकार की आँख की किरकिरी बन गए थे. सितम्बर २००८ में सरकार ने आधी रात को शैलेन्द्र को लखनऊ स्थित आवास से गिरफ्तार करवा लिया था. हजरतगंज थाने में सारी रात हवालात में काटने के बाद कांग्रेस ने उनकी गिरफ्तारी को पूरे प्रदेश में मुद्दा बना दिया था. तब पार्टी की प्रदेश अध्यछ रीता बहुगुणा शैलेन्द्र की गिरफ्तारी को मुद्दा बनाने में सबसे आगे थीं. लेकिन यही रीता बहुगुणा और कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह ने बाहुबली विधायक अजय राय के घर जाकर चाय पी और शैलेन्द्र को नाराज़ कर लिया. शैलेन्द्र जब डी.एस.पी थे तब अजय राय एस.टी.एफ की हिट लिस्ट में हुआ करते थे. कुछ दिन पहले ही तुलसी सिंह को कांग्रेस ज्वाइन कराई गई. तुलसी सिंह मकोका में जेल जा चुके हैं.
मिशन २०१२ में जुटी कांग्रेस ने हाल में दस स्थानों से रथ यात्रा निकाली है लेकिन बुलंदशहर में यह यात्रा 'बार डांसर्स' की वजह से विवादों में आ गई. शैलेन्द्र प्रताप कांग्रेस के इस भटकाव से खफा हैं. शैलेन्द्र की नाराज़गी की एक और वजह है. पिछले १९ अप्रैल को शैलेन्द्र प्रताप की अगुवाई में दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना और मार्च का कार्यक्रम था. उस कार्यक्रम में दिग्विजिय सिंह को जाना था लेकिन ऐंन वक्त दिग्विजय ने फोन करके शैलेन्द्र को बताया कि वे नहीं आ सकते. चिलचिलाती धूप में शैलेन्द्र की अगुवाई में अपने खर्चे से गए करीब छ हज़ार गरीब मायूस होकर लौटे. पुलिस ने उन्हें सडकों पर निकलने नहीं दिया और कांग्रेस का कोई नेता उनसे मिलने नहीं गया. मायूस गरीबों ने शैलेन्द्र से यह कहकर अपनी शिकायत दर्ज कराई कि क्या राहुल गाँधी गरीब दलितों की बस्ती में जाकर महज नाटक करते हैं.
नाराज़ शैलेन्द्र ने अपनी शिकायतों का पुलिंदा सीधे राहुल गाँधी को भेजा है. लेकिन अभी तक उन्हें कोई जबाब नहीं मिला है. राहुल गाँधी की चुप्पी और प्रदेश कांग्रेस नेताओं के रवैये से शैलेन्द्र की नाराज़गी और बढ़ गई है. सूत्रों की माने तो ये नाराजगी बहुत जल्द उनके इस्तीफे में बदल सकती है.

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

चिदंबरम साहब ऐसे तो नहीं जाएगा नक्सलवाद!

अजय कुमार सिंह
गृहमंत्री पी.चिदंबरम की क़ाबलियत पर देश में शायद ही किसी को संदेह होगा. लेकिन नक्सलवाद के सफाए लिए पिछले कुछ अरसे से उनकी हर बात उलटी पड़ रही है. छः अप्रैल को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के जंगलों  में 76 सीआरपीएफ के जवानों को नक्सलवादियों ने जिस तरह निशाना बनाया वो शर्मनाक है. सरकार को समीछा करनी पड़ेगी कि आखिर क्यों हमारे प्रशिछित सुरछाबल जरा सी विपरीत परिस्थितियों में मुंह के बल गिरते हैं. कमी कहाँ है? गृह मंत्री के तौर पर यह घटना मिस्टर चिदंबरम के लिए व्यक्तिगत रूप से सोचनीय है. उन्हें मंथन करना चाहिए कि आखिर क्यों पिछले एक साल से बतौर गृहमंत्री वे जब भी नक्सलवाद के सफाए की बात करते हैं, नक्सली और ज्यादा मज़बूत हो जाते हैं. मि.चिदंबरम को अपना कन्फ्यूज़न भी दूर करना होगा. पता नहीं क्यों वे कभी नक्सलवादियों को देश का सबसे बड़ा दुश्मन बताते हैं तो कभी उनसे बातचीत की पेशकश करते हैं. अभी एक हफ्ते पहले ही केंद्र सरकार ने मीडिया में करोड़ों के विज्ञापन जारी कर नक्सलियों से बातचीत का रास्ता अख्तियार करने और मुख्यधारा में लौट आने की अपील की थी. फिर मि.चिदंबरम पश्चिम बंगाल पहुँच गए और बुद्धदेव की सरकार पर नक्सलवादियों के प्रति नरम रुख रखने का आरोप लगाने लगे. मि.चिदंबरम ने कहा कि राज्य सरकारों को नक्सलवादियों के सफाए के लिए केंद्र से तालमेल बिठाना चाहिए. दंतेवाड़ा के जंगलों में जो कुछ हुआ उसे भी राज्य ख़ुफ़िया विभाग की विफलता बता कर चिदंबरम पल्ला झड़ने की कोशिश में लगे हैं. गृहमंत्री के रूप में जिम्मेदारी लेने से बचने की उनकी कोशिशों का पहले पश्चिम बंगाल फिर छत्तीसगढ़ की सरकार ने कड़ा विरोध किया है. उधर दंतेवाड़ा की घटना ने अन्दर ही अन्दर केंद्र सरकार को हिलाकर रख दिया है. भीतर से मि. चिदंबरम भी समझ रहे हैं की समस्या की जड़ कहाँ है और कमी किस स्तर पर है. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि फिलहाल वे राजनीति से ज्यादा कुछ नहीं कर रहे. सवाल ये है कि क्या यह राजनीति नासूर बनते जा रहे नक्सलवाद से थोड़ी भी राहत दिला पाएगी. जब तक सरकारें नक्सलवाद की विचारधारा के  उदभव स्थल  तक नहीं पहुंचतीं तब तक राहत मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता. नक्सलवाद और आतंकवाद के फर्क को समझना होगा. मजहब के नाम पर खून बहाने वालों और खोखली ही सही पर क्रांति के नाम पर हिंसा को जायज ठहराने वाले गुमराह नौजवानों में कुछ तो अंतर होगा. जाहिर है सरकार को दोनों से निपटना है लेकिन दोनों के लिए तरीका तो अलग-अलग होना चाहिए ना. उदारीकरण जैसे भ्रम से भरे शब्द का इस्तेमाल कर देश की अर्थव्यवस्था को पूरी दुनिया के लिए खोल देने वाले मनमोहन सिंह ने पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान एक इंटरव्यू  में बड़ी मासूमियत से कबूल किया था कि भूमंडलीकरण के पहले चरण में गरीबी बढ़ेगी. मनमोहन सिंह की खासियत यह है कि वे खतरनाक से खतरनाक बात मुस्कुराते हुए बड़ी सहजता  से कहते हैं. लेकिन बात जब देश में बढ़ती गरीबी, बेरोज़गारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से निपटने की हो तो डाक्टर सिंह की यह सहजता काम नहीं आती. नक्सलवाद के मसले पर भी वे अप्रसांगिक हो जाते हैं. गृहमंत्री चिदंबरम भी कुछ कर नहीं पा रहे. बस राज्य सरकारों पर जिम्मेदारी डालने की राजनीति करके काम चला रहे हैं. कानून व्यवस्था राज्य का विषय है यह कौन नहीं जानता लेकिन नक्सलवाद की समस्या का समाधान अकेले राज्य तो नहीं कर सकते. केन्द्रीय सुरछाबलों और राज्य मशीनरी के बीच तालमेल जरूरी है लेकिन सही मायनों में तालमेल के लिए कोरी राजनीति से ऊपर उठकर ईमानदार कोशिशें होनी चाहियें.           

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भारत मैं नक्सल समस्या का समाधान कैसे होगा

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