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शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

मधु कोडा ने नया क्या किया

झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा पर चार हज़ार करोड के घोटाले का आरोप लगा है। सीबीआई जाँच शुरू होते ही जैसा की हर बड़े आदमी के साथ होता है मधु की तबियत भी बिगड़ गई है। टेलीविजन के परदे पर मधु को स्ट्रेचर पर रखकर अस्पताल ले जाते देखना और उनके पिता को गुस्से के साथ बिलखता देखना किसी को अच्छा नही लग सकता। लेकिन भारत में सार्वजनिक जीवन का वरण कर लोकहित की शपथ लेने वालों की ऐसी तस्वीरें अक्सर दिख जाती हैं। नरसिम्हा राव, सुखराम, सीबू सोरेन, लालू यादव, मायावती जैसों की एक लम्बी फेहरिस्त है। ऐसे नेताओं ने बार-बार हमारी नज़रो के सामने अपना असली चेहरा उजागर किया है। हमसे इनके बारे में कुछ भी छुपा नहीं है। बहन जी तो साफ-साफ बताती भी हैं कि उनका जन्मदिन कई सालों से पार्टी के लिए सहयोग दिवस के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। बहन जी का तर्क है कि उनकी पार्टी गरीबों के चंदे से चलती है जबकि बाकी पार्टियाँ उद्द्योगपतियों से पैसा लेती हैं। अब बहन जी की पार्टी उद्द्योगपतियों से पैसा लेती है या नहीं ये तो जाँच का विषय है लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं की भारत के ज्यादातर राजनीतिक दल बडे-बडे उद्दोगपतियों से करोड़ों में चंदा लेते रहे हैं। जाहिर है इस चंदे के बदले ये उद्दोगपति भी सत्ता में आने के बाद राजनीतिक दलों से अपना मुनाफा जरूर वसूलते होंगे। अगर ये सच है तो फ़िर सोच लीजीये भारत में भ्रस्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। हाल में उच्चतम न्यायलय के जस्टिस काटजू ने कहा की भारत में भ्रस्टाचार की समस्या का कोई इलाज नहीं। कुछ लोगों को याद होगा कि प्रधानमंत्री रहते इन्द्र कुमार गुजराल ब्यवस्था से इतने नाराज़ हुए कि एकबारगी धरने पर बैठने जा रहे थे। भारत में ब्यवस्था के बिगड़ने और भ्रस्टाचार के इतने बडे सबूत मिल चुके हैं की अब इस बारे में कुछ कहना-सुनना बाकी नहीं रहा। लेकिन सवाल ये है कि क्या भ्रस्टाचार हमारे लिए कोई मुद्दा है। क्या हम पर इस बात का कोई फर्क पड़ता है कि हमारे नेता और अधिकारी मिल कर हमें लूटने लगे हैं। प्रथम विश्व युद्घ के बाद जर्मनी की खस्ता हालत के अलावा भ्रस्टाचार एक बड़ा मुद्दा था जिसने हिटलर को जन्म दिया। हिटलर की हम चाहे जितनी आलोचना करें और उस कत्लेआम के लिए करनी भी चाहिए लेकिन सच ये है कि हिटलर ने ही उस दौर में जर्मनी को तबाही से उबारकर एक मजबूत अर्थब्यवस्था दी थी। भारत में अभी वैसे हालात नहीं लेकिन बढती महंगाई, मंदी और गरीबी के चलते हालात बेहतर भी नहीं कहे जा सकते। आज-नहीं तो कल हमें इस बारे में सोचना ही होगा। हम नहीं सोचेंगे तो कोई हिटलर हमें सोच्वायेगा। बेहतर होगा अगर हम ख़ुद ही इन मुद्दों पर सोचना शुरू करें और वोट देते वक्त इन्हें याद रखें। ताकि मधु कोडा जैसे तस्वीरें भारत में आम ना रहें।

1 टिप्पणी:

  1. bdiya hai bhai baat sirf itni hi hai ki humne brastachar ko rojmara ki jindgi ka hisa man liya hai ;
    aur ager kahi se ye khatam hoga to shuruwat khud se karni padegi

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