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रविवार, 8 अगस्त 2010

दुधारू की दुल्लती

अरसे से जलयुक्त दूध का रसास्वादन करने के बाद आजकल मेरे घर वालों पर शुद्ध दूध मंगाने का शौक सवार हुआ है. जाहिर है इस कष्टप्रद काम को अमली जामा पहनाने के लिए मैं सबसे उपयुक्त माना गया हूँ. नतीजतन पिछले एक हफ्ते से सुबह पॉँच बजे ही बिस्तर से उठा दिया जाता हूँ. चाहूं- ना चाहूं क्या फर्क पड़ता है. दूध की बाल्टी लेकर उनीदीं आखों को मलते ग्वाले के घर पहुंचना ही पड़ता है. आजकल रोज़ सुबह शुरुआत ऐसे ही होती है. आज सुबह ग्वाले के घर पहुंचा तो वो गाय के दोनों पैरों को बांधने में जुटा था. इस गाय ने १४ रोज़ पहले एक बछड़े को जन्म दिया है. थोड़ी देर में बछड़ा छोड़ा जाता है. खूंटे से छूटते ही बछड़ा दौड़ कर गाय के थन के पास पहुँचता है और जोर-जोर से मुंह मारते हुए दूध पीना शुरू कर देता है. उधर गाय बछड़े का शरीर चाट रही होती है. वात्सल्य का कैसा प्यारा दृश्य था. बामुश्किल ३० सेकेण्ड गुजरे होंगे. तभी ग्वाले ने गले में बंधी रस्सी से बछड़े को खींच लिया. पता नहीं क्यों मुझे बहुत बुरा लगा. मन में सोचने लगा इंसान कितना स्वार्थी है.....मैं अभी इस विचार से जूझ ही रहा था कि बछड़े ने रस्सी तुड़ाने की कोशिश की लेकिन ग्वाले ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. अलबत्ता बछड़े की इस हरकत से ग्वाला को गुस्सा आ गया और उसने बछड़े की पीठ पर दो हाँथ जमा दिए. १४ दिन के बछड़े की पिटाई! देखी ना गई. मुंह से अनायास ही निकल पड़ा. उन्हह..उन्हह....मारो नहीं...! बछड़े को बांध अब ग्वाला गाय को दुहने में जुट गया. गाय की दोनों आँखों से आंसुओं की दो धार निकलती साफ़ नज़र आ रही थीं. मानो अपने नवजात के साथ हो रही ज्यादती का दर्द आँखों से छलक आया हो लेकिन बेफिक्र ग्वाला उस बेचारी गाय के थन से दूध निकालने में जुटा था. अपने काम में ग्वाला इस कदर लीन था कि उसे एहसास ही नहीं रहा कि कब गाय के पैरों में बंधी रस्सी ढीली पड़ गई. ग्वाला दूध दुहता रहा और गाय के पैरों से लगायत पूरे शरीर पर बैठे मच्छर उसे डसते रहे. इसी बीच कसमसाती गाय ने ग्वाले को एक दुल्लती मारी. ग्वाला पीछे पीठ के बल गिरा लेकिन बाल्टी उसके हाँथ में ही रही. उसने दूध को गिरने से बचा लिया था. थोड़ी देर पहले ग्वाले का गुस्सा देख चुका मैं सोच रहा था कि ग्वाला अब गाय पर टूट पड़ेगा. पर! ये क्या? ग्वाले पर तो जैसे गाय की दुलत्ती का कोई असर ही नहीं हुआ. वो मुस्कुराते हुए उठा. गाय के पैरों में दुबारा रस्सी बांधी और दूध दुहने में जुट गया. मैंने सुना बहुत था आज देख भी लिया, ऐसी होती है दुधारू की दुल्लती.        

1 टिप्पणी:

  1. ऐसा नहीं है की ये पंक्ति पढ़ कर मन मैं दुख नहीं होता. परन्तु जब हम करीब से देखते हैं तो सच अलग भी होता है. मेरे बचपन मैं हम ने घर मैं एक बचिया पाली और करीब ४ सालो मैं हमारे घर ३ गाये दूध देने के लिए तैयार हो गई. ३-४ बछड़े और बछियें. आम भाषा मैं गाय का गरम होना और गाय नयी करना कोई बुरे सब्दो मैं नहीं आते. मैं खुद जानवरों के डॉक्टर को ले कर आया करता था क्यूंकि सांडो से क्रोस कराने मैं बीमारी का खतरा होता है. इस पर भी गाय जब बच्चा देती है तो पूरी कोशिस करती है की अपने बच्चे को खूब दूध पिलाए. वो दूध को अपने थनो मैं चढा जाती है. ये एक कला है. और जब गाय का बच्चा जरूरत से जयादा दूध पीता है तो सैफैद दस्त करता है. डॉक्टर के पास भाई कभी कभी दवाई नहीं होती जिससे बच्चा बच जाए.

    ये सही है की पैसे के लिए गाये के बच्चो को वो सब नहीं मिलता जिसके वो हकदार हैं.. पर उस का एक कारण दूध वाले की गरीबे भी है.. गाय की खाल चूरी आज की तारीख मैं आदमी के खाने के सामान से भी महँगी है.

    अगर बच्चा के पिटाए भी की जाती है तो जरूरी नहीं की हमेशा दूध वाला ही गलत हो.

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