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रविवार, 15 अगस्त 2010

दुखी मन मेरे मन मेरा कहना जहाँ नहीं चैना वहां........

अजय कुमार सिंह
अंग्रेजों के भारत से चले जाने के ६३ साल बाद एक बार फिर हमे हर तरफ वही घिसी-पिटी तकरीरें सुनने-पढ़ने को मिल रही हैं. वही पुराने शीर्षक 'हम कितने आज़ाद हुए.......',  'सच्ची आज़ादी कब मिलेगी.....', 'आज़ादी के मायने.....' 'क्या हम सचमुच आज़ाद हैं.....?' घुमा फिर कर हर लेख में यही बात है कि हमारे महापुरुषों ने जिस मकसद से आजादी हासिल की थी वो पूरा नहीं हुआ.
बड़ी दिक्कत है भाई. मैं बड़ा कन्फ्यूज़ हूँ. अभी पिछले साल जब चीन ने अपना ६० वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया तो हमारी आँखें फटी रह गईं. हमारे टीवी चैनलों ने तो चीनी सेना और भारतीय सेना की जोरशोर से तुलना भी शुरू कर दी. सबसे ज्यादा बुरा तो यह लगा कि कुछ चैनलों ने चीनी सेना को हमारी सेना से दुगुना ताकतवर बताते हुए यह कहना शुरू कर दिया कि अगर युद्ध हुआ तो हमारी सेना अमेरिका की सेना के साथ मिलकर चीनी सेना के छक्के छुड़ा देगी. हालांकि नवम्बर २००९ में चीन के तीन दिवसीय दौरे पर गये ओबामा ने कश्मीर के मसले में चीन को पंचायत का स्कोप देकर कई भ्रम मिटा दिए.
हम हिन्दुस्तानी पता नहीं किस सपने रहते हैं. ये होना चाहिए. ये होगा तो ये हो जायेगा. पता नहीं क्या-क्या सोचते रहते हैं. बस करते उतना ही हैं जितने से अपना काम चल जाए. अब देखिये ना! १५ अगस्त आया नहीं कि एक से एक वक्तव्य आने लगे. कोई फर्जी उपलब्धियों का बखान कर रहा है तो कोई सबको कुंठित करने में जुटा है. जबकि दोनों ही अच्छी तरह जानते हैं उन्हें देश से कोई लेना-देना नहीं है. बस! कुछ बोलना है, लिखना है सो कोरम पूरा कर दिया.
बड़ी बिनम्रता से मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि देश के बारे में आप जब भी कुछ अच्छा या कड़वा सच बोलें तो याद रखें कि सिर्फ बयानबाज़ी या लेखन से किसी देश के हालात नहीं बदला करते. यदि आप वाकई हालात बदलने के लिए गंभीर हैं तो फिर आपको ईमानदार  कोशिश करनी होगी.यह कहने से काम नहीं चलेगा कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. या तो आप कुछ करके बदलाव की नीव डालिए या फिर चुप रहिये. अगर ये दोनों नहीं कर सकते और वाकई हालात से दुखी हैं तो फिर फंटूश फिल्म में किशोर कुमार द्वारा गया वो गाना याद कीजिये......दुखी मन मेरे मन मेरा कहना......जहाँ नहीं चैना वहां नहीं रहना!
 

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