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मंगलवार, 4 मई 2010

गुरूजी से क्या भूल हुई!



सत्येंद्र श्रीवास्तव, वाराणसी रौनाखुर्द, बेला (चोलापुर) निवासी लौटन प्रसाद वर्मा को दोनों पैरों में जंजीर बांधकर रखा जा रहा है। वह महज पांच साल पहले सहायक अध्यापक थे। बच्चों को ककहरा पढ़ाते थे। अब चारपाई की बाध (रस्सी) गिन रहे हैं। उन्हें अंग्रेजी की वर्णमाला भी नहीं भूली है। इसकी तस्दीक गांव-गिरांव के बच्चे करते हैं। इन बच्चों को ही तो देखकर उनके मुंह से ए, बी, सी, डी..निकलने लगता है। यह सब उस दौर में हो रहा है जब मानवाधिकार के नाम पर खड़े हुए हौवे ने पुलिस मुठभेड़ों में भारी कमी ला दी है। परिवारों के मसले में मानवाधिकार का सवाल खड़ा होने लगा है। ऐसे दौर में लौटन प्रसाद वर्मा के साथ ऐसा अमानवीय बर्ताव चौंकानेवाला है। खास यह कि इस ओर नजर डालने की जहमत भी किसी झंडाबरदार ने नहीं उठाई है। बावजूद इसके कि लौटन प्रसाद को जंजीर लगाने वाले परिजन इस मसले को खुद बार-बार प्रशासन के पास ले जाते रहे हैं। फिर भी लौटन प्रसाद की दशा में सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही है। दरअसल, लौटन प्रसाद के पागल हो जाने के पीछे भी एक कहानी है और इसके सूत्रधारों की कारस्तानियों ने एक हंसते-खेलते परिवार को बदहाल कर दिया है। लौटन प्रसाद के परिवार में पांच बेटियां और एक बेटा है। तीन बेटियों की शादी हो चुकी है। दो युवा बेटियों की शादी की चिंता उनकी पत्नी शांति देवी को खाए जा रही है। इनकी (पति) हालत ठीक होती तो कोई बात नहीं थी। इन्हें तो इनके साथियों ने ही पागल कर दिया। उनका बेटा संतोष बीकॉम पास है। वह पिता के पागलपन को एक साजिश बताता है। संतोष का साफ कहना है कि श्री विश्वकर्मा पूर्व माध्यमिक विद्यालय, रौनाखुर्द में उसके पिता लौटन प्रसाद वर्मा 6 दिसंबर 1977 को बतौर सहायक अध्यापक तैनात हुए। आगे चलकर प्रबंधन से जुड़े कतिपय लोगों के मन में लालच आ गया। किसी चहेते की नियुक्ति के लिए तानाबाना बुना गया। पिताजी पर अत्याचार शुरू हो गए। प्राचार्य के सामने साथी अध्यापकों ने जूता तक साफ कराया। फिर भी प्रबंधन की ओर से ऐसा करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इन बातों का लौटन प्रसाद के दिमाग पर गहरा असर हो गया। वह लोगों से नजरें चुराने लगे। इसकी तस्दीक उनसे मिलकर ही हो जाती है। मिलते ही वह अपने चेहरे को हाथों से ढंकने की कोशिश करते हैं। पूछने पर सिर्फ अपना नाम बताते हैं। दूसरे सवाल छिड़ते ही उनकी बेचैनी बढ़ जाती है। परिजन कहते हैं-पहले ऐसे नहीं थे। शायद विद्यालय में हुए सार्वजनिक अपमान की वजह से ही उनमें मनोरोग के लक्षण उभरने लगे। 1 नवंबर 2004 से 15 सितंबर 2005 तक इलाज भी कराया गया। इलाज के दौरान लौटन प्रसाद वर्मा विद्यालय में अनियमित हो गए थे। इसका बाकायदा सरकारी डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट दिया गया। फिर भी विद्यालय प्रबंधन ने उन पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का दबाव बनाना शुरू कर दिया। उनकी बीए पास बेटी कुसुम कहती है-पिताजी को वर्ष 2009 में रिटायर होना था लेकिन उनसे 2006 में वीआरएस पर दस्तखत करा लिया गया। इसके बाद पिताजी की हालत बिगड़ती चली गई। एक स्थिति ये आई कि वह इधर-उधर भागने-दौड़ने लगे।
इस स्थिति में लौटन प्रसाद के साथ कोई अनहोनी न हो जाए इससे बचने के लिए घर में चारपाई पर दोनों पैरों में जंजीर बांधकर रखा जाता है। सुधबुध खो चुके लौटन प्रसाद अपनी बेबस आंखों से अपनी बगिया को बदहाल देख रहे हैं। इनकी स्थिति पर तरस खाने की बजाय विद्यालय प्रबंधन ने उनके सेवानिवृत्ति के बाद के पावने रिलीज कराने में रुचि नहीं ले रहा है। इतना ही नहीं परिवार पर लगातार इस बात के लिए दबाव बनाया जा रहा है कि वीआरएस डेट 2004 कर दी जाए। लौटन प्रसाद वर्मा की पेंशन-ग्रेच्युटी तक का भुगतान नहीं हो रहा है। खास बात यह कि इसकी शिकायत शिक्षा विभाग ही नहीं कलेक्टर तक से की जा चुकी है। फिर भी सुनवाई नहीं हो रही है। पत्नी शांति देवी कहती हैं-बेटियों की शादी हो जाए, घर चली जाएं तब कोई ंिचंता नहीं रहेगी। बेटे-बहू कहीं और रह लेंगे। तब कम से कम पैरों से जंजीर खोलने की बात तो सोच सकतेसत्येंद्र श्रीवास्तव, वाराणसी रौनाखुर्द, बेला (चोलापुर) निवासी लौटन प्रसाद वर्मा को दोनों पैरों में जंजीर बांधकर रखा जा रहा है। वह महज पांच साल पहले सहायक अध्यापक थे। बच्चों को ककहरा पढ़ाते थे। अब चारपाई की बाध (रस्सी) गिन रहे हैं। उन्हें अंग्रेजी की वर्णमाला भी नहीं भूली है। इसकी तस्दीक गांव-गिरांव के बच्चे करते हैं। इन बच्चों को ही तो देखकर उनके मुंह से ए, बी, सी, डी..निकलने लगता है। यह सब उस दौर में हो रहा है जब मानवाधिकार के नाम पर खड़े हुए हौवे ने पुलिस मुठभेड़ों में भारी कमी ला दी है। परिवारों के मसले में मानवाधिकार का सवाल खड़ा होने लगा है। ऐसे दौर में लौटन प्रसाद वर्मा के साथ ऐसा अमानवीय बर्ताव चौंकानेवाला है। खास यह कि इस ओर नजर डालने की जहमत भी किसी झंडाबरदार ने नहीं उठाई है। बावजूद इसके कि लौटन प्रसाद को जंजीर लगाने वाले परिजन इस मसले को खुद बार-बार प्रशासन के पास ले जाते रहे हैं। फिर भी लौटन प्रसाद की दशा में सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही है। दरअसल, लौटन प्रसाद के पागल हो जाने के पीछे भी एक कहानी है और इसके सूत्रधारों की कारस्तानियों ने एक हंसते-खेलते परिवार को बदहाल कर दिया है। लौटन प्रसाद के परिवार में पांच बेटियां और एक बेटा है। तीन बेटियों की शादी हो चुकी है। दो युवा बेटियों की शादी की चिंता उनकी पत्नी शांति देवी को खाए जा रही है। इनकी (पति) हालत ठीक होती तो कोई बात नहीं थी। इन्हें तो इनके साथियों ने ही पागल कर दिया। उनका बेटा संतोष बीकॉम पास है। वह पिता के पागलपन को एक साजिश बताता है। संतोष का साफ कहना है कि श्री विश्वकर्मा पूर्व माध्यमिक विद्यालय, रौनाखुर्द में उसके पिता लौटन प्रसाद वर्मा 6 दिसंबर 1977 को बतौर सहायक अध्यापक तैनात हुए। आगे चलकर प्रबंधन से जुड़े कतिपय लोगों के मन में लालच आ गया। किसी चहेते की नियुक्ति के लिए तानाबाना बुना गया। पिताजी पर अत्याचार शुरू हो गए। प्राचार्य के सामने साथी अध्यापकों ने जूता तक साफ कराया। फिर भी प्रबंधन की ओर से ऐसा करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इन बातों का लौटन प्रसाद के दिमाग पर गहरा असर हो गया। वह लोगों से नजरें चुराने लगे। इसकी तस्दीक उनसे मिलकर ही हो जाती है। मिलते ही वह अपने चेहरे को हाथों से ढंकने की कोशिश करते हैं। पूछने पर सिर्फ अपना नाम बताते हैं। दूसरे सवाल छिड़ते ही उनकी बेचैनी बढ़ जाती है। परिजन कहते हैं-पहले ऐसे नहीं थे। शायद विद्यालय में हुए सार्वजनिक अपमान की वजह से ही उनमें मनोरोग के लक्षण उभरने लगे। 1 नवंबर 2004 से 15 सितंबर 2005 तक इलाज भी कराया गया। इलाज के दौरान लौटन प्रसाद वर्मा विद्यालय में अनियमित हो गए थे। इसका बाकायदा सरकारी डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट दिया गया। फिर भी विद्यालय प्रबंधन ने उन पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का दबाव बनाना शुरू कर दिया। उनकी बीए पास बेटी कुसुम कहती है-पिताजी को वर्ष 2009 में रिटायर होना था लेकिन उनसे 2006 में वीआरएस पर दस्तखत करा लिया गया। इसके बाद पिताजी की हालत बिगड़ती चली गई। एक स्थिति ये आई कि वह इधर-उधर भागने-दौड़ने लगे। इस स्थिति में लौटन प्रसाद के साथ कोई अनहोनी न हो जाए इससे बचने के लिए घर में चारपाई पर दोनों पैरों में जंजीर बांधकर रखा जाता है। सुधबुध खो चुके लौटन प्रसाद अपनी बेबस आंखों से अपनी बगिया को बदहाल देख रहे हैं। इनकी स्थिति पर तरस खाने की बजाय विद्यालय प्रबंधन ने उनके सेवानिवृत्ति के बाद के पावने रिलीज कराने में रुचि नहीं ले रहा है। इतना ही नहीं परिवार पर लगातार इस बात के लिए दबाव बनाया जा रहा है कि वीआरएस डेट 2004 कर दी जाए। लौटन प्रसाद वर्मा की पेंशन-ग्रेच्युटी तक का भुगतान नहीं हो रहा है। खास बात यह कि इसकी शिकायत शिक्षा विभाग ही नहीं कलेक्टर तक से की जा चुकी है। फिर भी सुनवाई नहीं हो रही है। पत्नी शांति देवी कहती हैं-बेटियों की शादी हो जाए, घर चली जाएं तब कोई ंिचंता नहीं रहेगी। बेटे-बहू कहीं और रह लेंगे। तब कम से कम पैरों से जंजीर खोलने की बात तो सोच सकते! 

2 टिप्‍पणियां:

  1. पूरी पोस्ट पढ़ी। अत्यंत खेदजनक। अस्सीम दुःख है । नहीं जानती क्या करूँ । मन करता है , दोषियों को पकड़ कर मारूँ। किसी की जिंदगी बर्बाद करने का हक किसी को नहीं।

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