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रविवार, 3 जनवरी 2010

उत्तरायण गच्छामि!


अजय कुमार सिंह
सूर्य १५ जनवरी को उत्तरायण में प्रवेश करेंगे। इस दिन पूरे देश में उत्सव होगा। कहीं मकर संक्रांति, कहीं खिचड़ी, कहीं पोंगल तो कहीं लोहड़ी। मान्यता के अनुसार इसी दिन से कड़ाके की ठण्ड भी अपना मिजाज़ बदल लेगी। मौसम में खुशगवारी आ जाएगी। कलियाँ फूल की शक्ल ले लेंगी तो पेड़ों पर आई नई पत्तियां चारों ओर हरयाली के मनमोहनी नज़ारों को नुमाया कराएंगी। ऐसे मौसम में पशु-पछी-पेड़-पौधे और सृष्टि के अन्य भौतिक-लौकिक, चर-अचर अकस्मात् कुछ अधिक सुन्दर लगने लगेंगे। स्वाभाविक है कि इंसानों पर भी इसका असर पड़ेगा। हमारे यहाँ बसंत में लोगों पर चढ़ा प्रेम का मद फाल्गुन आते-आते चरम पर होता है। सृष्टि के साथ-साथ उसमे शामिल हर वस्तु प्यारी लगने लगती है। विशेषकर विपरीत लिंग के प्रति आसक्ति बढ़ जाती है। किशोरावस्था में तो ह्रदय की धडकनों पर कोई जोर ही नहीं होता। हमारे यहाँ पश्चिम की तरह वेलेंटाईन डे मनाने का प्रचलन दो दशक पहले ही शुरू हुआ है लेकिन प्रेम प्रदर्शन की परम्परा अत्यंत प्राचीन है। कालिदास के शाकुंतलम या वात्सायन के कामसूत्र से ही नहीं बल्कि देश के कोने-कोने की लोकसंस्कृति में प्रेमी-प्रेयसी के वार्तालाप और संबंधों के वृत्तांत मिल जाते हैं। खजुराहो की प्रेमक्रीडा सम्बन्धी मूर्तियाँ विश्व प्रसिद्ध हैं परन्तु हमारे देश में प्रेम को परिभाषित करने के लिए किसी मूर्ति की आवश्यकता नहीं है। यहाँ तो जन-जन के ह्रदय में प्रेम बसा है। हज़ारों वर्ष पूर्व जनकपुर स्वयंबर में गये श्रीरामचन्द्र जी ने वाटिका में पुष्प चुनने आईं जानकी को देखकर ही उनसे विवाह का निश्चय कर लिया था। राधा और गोपियों संग श्रीकृष्ण की रासलीला सारे जग में प्रसिद्ध है। हिन्दू धर्म में हुए इन दो प्रमुख भगवत अवतारों ने मानव जीवन में प्रेम की महत्ता का प्रसार ही किया। वैसे प्रेम की महत्ता समझने के लिए हमें किसी ग्रन्थ की भी जरूरत नहीं। हमारे यहाँ तो बचपन से लेकर युवावस्था और युवावस्था से वृद्धवस्था तक अगर कोई अनिवार्य भाव है तो वह है प्रेम। यह बसंत ऋतु प्रेम की उस भावना के उद्दवेलन के लिए सबसे अनुकूल है। उत्तरायण के दिन सारे देश में सार्वजानिक रूप से यही होता है। कुछ स्थानों पर विशेषकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में किसान इस दिन इश्वर के दरबार में अपनी पहली फसल का प्रसाद चढाते हैं ताकि इश्वर की कृपादृष्टी बनी रहे। युगों पहले हिमांचल के ज्वाला माता गुफा से भिछाटन करते-करते भैरो बाबा के शिष्य गोरखनाथ बाबा गोरखपुर पहुंचे। वहां उनके मंदिर में सदियों से खिचड़ी चढाने की परम्परा है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी वहां देश के कोने-कोने से लाखों लोग खिचड़ी चढाने जायेंगे। मंदिर परिसर में एक महीने तक मेला चलेगा। कुछ लोग गोरखपुर के इस मंदिर को पूर्वांचल के राजनितिक केंद्र के रूप में भी देखते हैं। ऐसा केंद्र जिसपर विभिन्न कारणों से हिन्दू कट्टरता के आरोप लगते हैं। यह धारणा खिचड़ी मेला के दौरान बेमानी सिद्ध होती है। इस मेला में मुसलमान ही नहीं इसाई भी बड़ी शिद्दत से शिरकत करते हैं। इसी तरह सम्प्रदायिक दंगों के लिए बदनाम गुजरात में भी इस दिन धर्म की दीवारें नज़र नहीं आतीं। यहाँ सुल्तानों के शासनकाल में इस दिन धार्मिक आयोजनों के बाद मनोरंजन के लिए पतंगबाजी की शुरुआत हुई। पतंगबाजी आज परम्परा की शक्ल ले चुकी है। नबाबों के शहर लखनऊ में भी पतंगबाजी जोर-शोर से होती है। भारत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ हिन्दू-मुसलमान-सिख-इसाई-पारसी-बौध-जैन और अन्य धर्मों के बीच मतभेदों के बावजूद सांझी विरासत का एहसास कहीं गहरे व्याप्त है। मकर संक्रांति से इस सांझी विरासत का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं परन्तु इस दिन अनायास ही हमें इसका सार्वजनिक प्रदर्शन देखने को मिल जाता है।

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