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मंगलवार, 20 जुलाई 2010

व्यक्ति से बड़ा परिवार 
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सोमवार, 12 जुलाई 2010




                         

मंगलवार, 4 मई 2010

गुरूजी से क्या भूल हुई!



सत्येंद्र श्रीवास्तव, वाराणसी रौनाखुर्द, बेला (चोलापुर) निवासी लौटन प्रसाद वर्मा को दोनों पैरों में जंजीर बांधकर रखा जा रहा है। वह महज पांच साल पहले सहायक अध्यापक थे। बच्चों को ककहरा पढ़ाते थे। अब चारपाई की बाध (रस्सी) गिन रहे हैं। उन्हें अंग्रेजी की वर्णमाला भी नहीं भूली है। इसकी तस्दीक गांव-गिरांव के बच्चे करते हैं। इन बच्चों को ही तो देखकर उनके मुंह से ए, बी, सी, डी..निकलने लगता है। यह सब उस दौर में हो रहा है जब मानवाधिकार के नाम पर खड़े हुए हौवे ने पुलिस मुठभेड़ों में भारी कमी ला दी है। परिवारों के मसले में मानवाधिकार का सवाल खड़ा होने लगा है। ऐसे दौर में लौटन प्रसाद वर्मा के साथ ऐसा अमानवीय बर्ताव चौंकानेवाला है। खास यह कि इस ओर नजर डालने की जहमत भी किसी झंडाबरदार ने नहीं उठाई है। बावजूद इसके कि लौटन प्रसाद को जंजीर लगाने वाले परिजन इस मसले को खुद बार-बार प्रशासन के पास ले जाते रहे हैं। फिर भी लौटन प्रसाद की दशा में सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही है। दरअसल, लौटन प्रसाद के पागल हो जाने के पीछे भी एक कहानी है और इसके सूत्रधारों की कारस्तानियों ने एक हंसते-खेलते परिवार को बदहाल कर दिया है। लौटन प्रसाद के परिवार में पांच बेटियां और एक बेटा है। तीन बेटियों की शादी हो चुकी है। दो युवा बेटियों की शादी की चिंता उनकी पत्नी शांति देवी को खाए जा रही है। इनकी (पति) हालत ठीक होती तो कोई बात नहीं थी। इन्हें तो इनके साथियों ने ही पागल कर दिया। उनका बेटा संतोष बीकॉम पास है। वह पिता के पागलपन को एक साजिश बताता है। संतोष का साफ कहना है कि श्री विश्वकर्मा पूर्व माध्यमिक विद्यालय, रौनाखुर्द में उसके पिता लौटन प्रसाद वर्मा 6 दिसंबर 1977 को बतौर सहायक अध्यापक तैनात हुए। आगे चलकर प्रबंधन से जुड़े कतिपय लोगों के मन में लालच आ गया। किसी चहेते की नियुक्ति के लिए तानाबाना बुना गया। पिताजी पर अत्याचार शुरू हो गए। प्राचार्य के सामने साथी अध्यापकों ने जूता तक साफ कराया। फिर भी प्रबंधन की ओर से ऐसा करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इन बातों का लौटन प्रसाद के दिमाग पर गहरा असर हो गया। वह लोगों से नजरें चुराने लगे। इसकी तस्दीक उनसे मिलकर ही हो जाती है। मिलते ही वह अपने चेहरे को हाथों से ढंकने की कोशिश करते हैं। पूछने पर सिर्फ अपना नाम बताते हैं। दूसरे सवाल छिड़ते ही उनकी बेचैनी बढ़ जाती है। परिजन कहते हैं-पहले ऐसे नहीं थे। शायद विद्यालय में हुए सार्वजनिक अपमान की वजह से ही उनमें मनोरोग के लक्षण उभरने लगे। 1 नवंबर 2004 से 15 सितंबर 2005 तक इलाज भी कराया गया। इलाज के दौरान लौटन प्रसाद वर्मा विद्यालय में अनियमित हो गए थे। इसका बाकायदा सरकारी डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट दिया गया। फिर भी विद्यालय प्रबंधन ने उन पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का दबाव बनाना शुरू कर दिया। उनकी बीए पास बेटी कुसुम कहती है-पिताजी को वर्ष 2009 में रिटायर होना था लेकिन उनसे 2006 में वीआरएस पर दस्तखत करा लिया गया। इसके बाद पिताजी की हालत बिगड़ती चली गई। एक स्थिति ये आई कि वह इधर-उधर भागने-दौड़ने लगे।
इस स्थिति में लौटन प्रसाद के साथ कोई अनहोनी न हो जाए इससे बचने के लिए घर में चारपाई पर दोनों पैरों में जंजीर बांधकर रखा जाता है। सुधबुध खो चुके लौटन प्रसाद अपनी बेबस आंखों से अपनी बगिया को बदहाल देख रहे हैं। इनकी स्थिति पर तरस खाने की बजाय विद्यालय प्रबंधन ने उनके सेवानिवृत्ति के बाद के पावने रिलीज कराने में रुचि नहीं ले रहा है। इतना ही नहीं परिवार पर लगातार इस बात के लिए दबाव बनाया जा रहा है कि वीआरएस डेट 2004 कर दी जाए। लौटन प्रसाद वर्मा की पेंशन-ग्रेच्युटी तक का भुगतान नहीं हो रहा है। खास बात यह कि इसकी शिकायत शिक्षा विभाग ही नहीं कलेक्टर तक से की जा चुकी है। फिर भी सुनवाई नहीं हो रही है। पत्नी शांति देवी कहती हैं-बेटियों की शादी हो जाए, घर चली जाएं तब कोई ंिचंता नहीं रहेगी। बेटे-बहू कहीं और रह लेंगे। तब कम से कम पैरों से जंजीर खोलने की बात तो सोच सकतेसत्येंद्र श्रीवास्तव, वाराणसी रौनाखुर्द, बेला (चोलापुर) निवासी लौटन प्रसाद वर्मा को दोनों पैरों में जंजीर बांधकर रखा जा रहा है। वह महज पांच साल पहले सहायक अध्यापक थे। बच्चों को ककहरा पढ़ाते थे। अब चारपाई की बाध (रस्सी) गिन रहे हैं। उन्हें अंग्रेजी की वर्णमाला भी नहीं भूली है। इसकी तस्दीक गांव-गिरांव के बच्चे करते हैं। इन बच्चों को ही तो देखकर उनके मुंह से ए, बी, सी, डी..निकलने लगता है। यह सब उस दौर में हो रहा है जब मानवाधिकार के नाम पर खड़े हुए हौवे ने पुलिस मुठभेड़ों में भारी कमी ला दी है। परिवारों के मसले में मानवाधिकार का सवाल खड़ा होने लगा है। ऐसे दौर में लौटन प्रसाद वर्मा के साथ ऐसा अमानवीय बर्ताव चौंकानेवाला है। खास यह कि इस ओर नजर डालने की जहमत भी किसी झंडाबरदार ने नहीं उठाई है। बावजूद इसके कि लौटन प्रसाद को जंजीर लगाने वाले परिजन इस मसले को खुद बार-बार प्रशासन के पास ले जाते रहे हैं। फिर भी लौटन प्रसाद की दशा में सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही है। दरअसल, लौटन प्रसाद के पागल हो जाने के पीछे भी एक कहानी है और इसके सूत्रधारों की कारस्तानियों ने एक हंसते-खेलते परिवार को बदहाल कर दिया है। लौटन प्रसाद के परिवार में पांच बेटियां और एक बेटा है। तीन बेटियों की शादी हो चुकी है। दो युवा बेटियों की शादी की चिंता उनकी पत्नी शांति देवी को खाए जा रही है। इनकी (पति) हालत ठीक होती तो कोई बात नहीं थी। इन्हें तो इनके साथियों ने ही पागल कर दिया। उनका बेटा संतोष बीकॉम पास है। वह पिता के पागलपन को एक साजिश बताता है। संतोष का साफ कहना है कि श्री विश्वकर्मा पूर्व माध्यमिक विद्यालय, रौनाखुर्द में उसके पिता लौटन प्रसाद वर्मा 6 दिसंबर 1977 को बतौर सहायक अध्यापक तैनात हुए। आगे चलकर प्रबंधन से जुड़े कतिपय लोगों के मन में लालच आ गया। किसी चहेते की नियुक्ति के लिए तानाबाना बुना गया। पिताजी पर अत्याचार शुरू हो गए। प्राचार्य के सामने साथी अध्यापकों ने जूता तक साफ कराया। फिर भी प्रबंधन की ओर से ऐसा करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इन बातों का लौटन प्रसाद के दिमाग पर गहरा असर हो गया। वह लोगों से नजरें चुराने लगे। इसकी तस्दीक उनसे मिलकर ही हो जाती है। मिलते ही वह अपने चेहरे को हाथों से ढंकने की कोशिश करते हैं। पूछने पर सिर्फ अपना नाम बताते हैं। दूसरे सवाल छिड़ते ही उनकी बेचैनी बढ़ जाती है। परिजन कहते हैं-पहले ऐसे नहीं थे। शायद विद्यालय में हुए सार्वजनिक अपमान की वजह से ही उनमें मनोरोग के लक्षण उभरने लगे। 1 नवंबर 2004 से 15 सितंबर 2005 तक इलाज भी कराया गया। इलाज के दौरान लौटन प्रसाद वर्मा विद्यालय में अनियमित हो गए थे। इसका बाकायदा सरकारी डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट दिया गया। फिर भी विद्यालय प्रबंधन ने उन पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का दबाव बनाना शुरू कर दिया। उनकी बीए पास बेटी कुसुम कहती है-पिताजी को वर्ष 2009 में रिटायर होना था लेकिन उनसे 2006 में वीआरएस पर दस्तखत करा लिया गया। इसके बाद पिताजी की हालत बिगड़ती चली गई। एक स्थिति ये आई कि वह इधर-उधर भागने-दौड़ने लगे। इस स्थिति में लौटन प्रसाद के साथ कोई अनहोनी न हो जाए इससे बचने के लिए घर में चारपाई पर दोनों पैरों में जंजीर बांधकर रखा जाता है। सुधबुध खो चुके लौटन प्रसाद अपनी बेबस आंखों से अपनी बगिया को बदहाल देख रहे हैं। इनकी स्थिति पर तरस खाने की बजाय विद्यालय प्रबंधन ने उनके सेवानिवृत्ति के बाद के पावने रिलीज कराने में रुचि नहीं ले रहा है। इतना ही नहीं परिवार पर लगातार इस बात के लिए दबाव बनाया जा रहा है कि वीआरएस डेट 2004 कर दी जाए। लौटन प्रसाद वर्मा की पेंशन-ग्रेच्युटी तक का भुगतान नहीं हो रहा है। खास बात यह कि इसकी शिकायत शिक्षा विभाग ही नहीं कलेक्टर तक से की जा चुकी है। फिर भी सुनवाई नहीं हो रही है। पत्नी शांति देवी कहती हैं-बेटियों की शादी हो जाए, घर चली जाएं तब कोई ंिचंता नहीं रहेगी। बेटे-बहू कहीं और रह लेंगे। तब कम से कम पैरों से जंजीर खोलने की बात तो सोच सकते! 

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

ब्रेकिंग न्यूज़! पूर्व डी.एस.पी शैलेन्द्र प्रताप छोड़ेंगे कांग्रेस

अजय कुमार सिंह
एस.टी.एफ डी.एस.पी की नौकरी छोड़कर राजनीति में दांव आजमाने वाले शैलेन्द्र प्रताप सिंह ने अब कांग्रेस छोड़ने का मन बना लिया है. शैलेन्द्र, कांग्रेस में अपराधियों की घुसपैठ से नाराज़ हैं. विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि शैलेन्द्र एक -दो रोज़ में कांग्रेस छोड़ने का एलान कर सकते हैं.
गौरतलब है कि कांग्रेस में शैलेन्द्र, सूचना का अधिकार टास्क फोर्स  के बतौर प्रमुख काम करते हैं. पिछले तीन सालों से शैलेन्द्र इस टास्क फ़ोर्स के जरिये मायावती सरकार की आँख की किरकिरी बन गए थे. सितम्बर २००८ में सरकार ने आधी रात को शैलेन्द्र को लखनऊ स्थित आवास से गिरफ्तार करवा लिया था. हजरतगंज थाने में सारी रात हवालात में काटने के बाद कांग्रेस ने उनकी गिरफ्तारी को पूरे प्रदेश में मुद्दा बना दिया था. तब पार्टी की प्रदेश अध्यछ रीता बहुगुणा शैलेन्द्र की गिरफ्तारी को मुद्दा बनाने में सबसे आगे थीं. लेकिन यही रीता बहुगुणा और कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह ने बाहुबली विधायक अजय राय के घर जाकर चाय पी और शैलेन्द्र को नाराज़ कर लिया. शैलेन्द्र जब डी.एस.पी थे तब अजय राय एस.टी.एफ की हिट लिस्ट में हुआ करते थे. कुछ दिन पहले ही तुलसी सिंह को कांग्रेस ज्वाइन कराई गई. तुलसी सिंह मकोका में जेल जा चुके हैं.
मिशन २०१२ में जुटी कांग्रेस ने हाल में दस स्थानों से रथ यात्रा निकाली है लेकिन बुलंदशहर में यह यात्रा 'बार डांसर्स' की वजह से विवादों में आ गई. शैलेन्द्र प्रताप कांग्रेस के इस भटकाव से खफा हैं. शैलेन्द्र की नाराज़गी की एक और वजह है. पिछले १९ अप्रैल को शैलेन्द्र प्रताप की अगुवाई में दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना और मार्च का कार्यक्रम था. उस कार्यक्रम में दिग्विजिय सिंह को जाना था लेकिन ऐंन वक्त दिग्विजय ने फोन करके शैलेन्द्र को बताया कि वे नहीं आ सकते. चिलचिलाती धूप में शैलेन्द्र की अगुवाई में अपने खर्चे से गए करीब छ हज़ार गरीब मायूस होकर लौटे. पुलिस ने उन्हें सडकों पर निकलने नहीं दिया और कांग्रेस का कोई नेता उनसे मिलने नहीं गया. मायूस गरीबों ने शैलेन्द्र से यह कहकर अपनी शिकायत दर्ज कराई कि क्या राहुल गाँधी गरीब दलितों की बस्ती में जाकर महज नाटक करते हैं.
नाराज़ शैलेन्द्र ने अपनी शिकायतों का पुलिंदा सीधे राहुल गाँधी को भेजा है. लेकिन अभी तक उन्हें कोई जबाब नहीं मिला है. राहुल गाँधी की चुप्पी और प्रदेश कांग्रेस नेताओं के रवैये से शैलेन्द्र की नाराज़गी और बढ़ गई है. सूत्रों की माने तो ये नाराजगी बहुत जल्द उनके इस्तीफे में बदल सकती है.

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

चिदंबरम साहब ऐसे तो नहीं जाएगा नक्सलवाद!

अजय कुमार सिंह
गृहमंत्री पी.चिदंबरम की क़ाबलियत पर देश में शायद ही किसी को संदेह होगा. लेकिन नक्सलवाद के सफाए लिए पिछले कुछ अरसे से उनकी हर बात उलटी पड़ रही है. छः अप्रैल को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के जंगलों  में 76 सीआरपीएफ के जवानों को नक्सलवादियों ने जिस तरह निशाना बनाया वो शर्मनाक है. सरकार को समीछा करनी पड़ेगी कि आखिर क्यों हमारे प्रशिछित सुरछाबल जरा सी विपरीत परिस्थितियों में मुंह के बल गिरते हैं. कमी कहाँ है? गृह मंत्री के तौर पर यह घटना मिस्टर चिदंबरम के लिए व्यक्तिगत रूप से सोचनीय है. उन्हें मंथन करना चाहिए कि आखिर क्यों पिछले एक साल से बतौर गृहमंत्री वे जब भी नक्सलवाद के सफाए की बात करते हैं, नक्सली और ज्यादा मज़बूत हो जाते हैं. मि.चिदंबरम को अपना कन्फ्यूज़न भी दूर करना होगा. पता नहीं क्यों वे कभी नक्सलवादियों को देश का सबसे बड़ा दुश्मन बताते हैं तो कभी उनसे बातचीत की पेशकश करते हैं. अभी एक हफ्ते पहले ही केंद्र सरकार ने मीडिया में करोड़ों के विज्ञापन जारी कर नक्सलियों से बातचीत का रास्ता अख्तियार करने और मुख्यधारा में लौट आने की अपील की थी. फिर मि.चिदंबरम पश्चिम बंगाल पहुँच गए और बुद्धदेव की सरकार पर नक्सलवादियों के प्रति नरम रुख रखने का आरोप लगाने लगे. मि.चिदंबरम ने कहा कि राज्य सरकारों को नक्सलवादियों के सफाए के लिए केंद्र से तालमेल बिठाना चाहिए. दंतेवाड़ा के जंगलों में जो कुछ हुआ उसे भी राज्य ख़ुफ़िया विभाग की विफलता बता कर चिदंबरम पल्ला झड़ने की कोशिश में लगे हैं. गृहमंत्री के रूप में जिम्मेदारी लेने से बचने की उनकी कोशिशों का पहले पश्चिम बंगाल फिर छत्तीसगढ़ की सरकार ने कड़ा विरोध किया है. उधर दंतेवाड़ा की घटना ने अन्दर ही अन्दर केंद्र सरकार को हिलाकर रख दिया है. भीतर से मि. चिदंबरम भी समझ रहे हैं की समस्या की जड़ कहाँ है और कमी किस स्तर पर है. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि फिलहाल वे राजनीति से ज्यादा कुछ नहीं कर रहे. सवाल ये है कि क्या यह राजनीति नासूर बनते जा रहे नक्सलवाद से थोड़ी भी राहत दिला पाएगी. जब तक सरकारें नक्सलवाद की विचारधारा के  उदभव स्थल  तक नहीं पहुंचतीं तब तक राहत मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता. नक्सलवाद और आतंकवाद के फर्क को समझना होगा. मजहब के नाम पर खून बहाने वालों और खोखली ही सही पर क्रांति के नाम पर हिंसा को जायज ठहराने वाले गुमराह नौजवानों में कुछ तो अंतर होगा. जाहिर है सरकार को दोनों से निपटना है लेकिन दोनों के लिए तरीका तो अलग-अलग होना चाहिए ना. उदारीकरण जैसे भ्रम से भरे शब्द का इस्तेमाल कर देश की अर्थव्यवस्था को पूरी दुनिया के लिए खोल देने वाले मनमोहन सिंह ने पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान एक इंटरव्यू  में बड़ी मासूमियत से कबूल किया था कि भूमंडलीकरण के पहले चरण में गरीबी बढ़ेगी. मनमोहन सिंह की खासियत यह है कि वे खतरनाक से खतरनाक बात मुस्कुराते हुए बड़ी सहजता  से कहते हैं. लेकिन बात जब देश में बढ़ती गरीबी, बेरोज़गारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से निपटने की हो तो डाक्टर सिंह की यह सहजता काम नहीं आती. नक्सलवाद के मसले पर भी वे अप्रसांगिक हो जाते हैं. गृहमंत्री चिदंबरम भी कुछ कर नहीं पा रहे. बस राज्य सरकारों पर जिम्मेदारी डालने की राजनीति करके काम चला रहे हैं. कानून व्यवस्था राज्य का विषय है यह कौन नहीं जानता लेकिन नक्सलवाद की समस्या का समाधान अकेले राज्य तो नहीं कर सकते. केन्द्रीय सुरछाबलों और राज्य मशीनरी के बीच तालमेल जरूरी है लेकिन सही मायनों में तालमेल के लिए कोरी राजनीति से ऊपर उठकर ईमानदार कोशिशें होनी चाहियें.           

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

कठिन डगर

जीवन के हसीन पलों में
साथी मिले बहुत
काँटों से चुभें
पथरीले पथ
हम तन्हा चलें
पहचानो ना पहचानो
क्या फर्क पड़े
कभी ऊंचाई कभी निचाई
तब संसार बने
ऐ वो छलिये
तूने इस जग में
कितने प्रपंच रचे

होलिया की हूक

(अजय कुमार सिंह)
भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री दिनेश त्रिवेदी २० फरवरी को गोरखपुर जा रहे हैं. वे वहां एन्सेफलाईटिस से लगातार हो रही मौतों पर अंकुश लगाने का प्रयास करेंगे. उनके पहले केंद्र से वेक्टर बोर्न डिसीज कण्ट्रोल की एक टीम भी जा रही है. केन्द्रीय मंत्री और वेक्टर बोर्न डिसीज़ कण्ट्रोल टीम के गोरखपुर जाने की खबर ने एक बार फिर उम्मीद जगाई है कि शायद पिछले ३० सालों से जारी एन्सेफलाईटिस का कहर अब थम जाएगा. लेकिन इसके साथ ही कुछ लाजमी आशंकाएं भी हैं. जो इस इलाके के कभी भी एन्सेफलाईटिस के चंगुल से बाहर न निकल पाने की कड़वी हकीकत में तब्दील हो सकती हैं. जाहिर है हम सबकी दुआ है कि ये आशंकाएं सच ना साबित हों और राज्यमंत्री के दौरे के कुछ सार्थक नतीजे निकलें. दुर्भाग्य से इस राह में कई रोड़े नज़र आ रहे हैं. चूंकि त्रिवेदी के पहले अम्बूमणिरामदौस भी केन्द्रीय स्वास्थ्यमंत्री के तौर पर इसी काम से गोरखपुर जाकर नाकाम हो चुके हैं. इन स्वास्थ्य मंत्रियों के अलावा राहुल गाँधी, टी.वी.राजेस्वर, अमर सिंह, सलमान खुर्शीद, श्रीप्रकाश जैसवाल, महावीर प्रसाद, मुलायम सिंह यादव आदि भी इस मामले में अपनी ताकत आजमा चुके हैं लेकिन एन्सेफलाईटिस के मच्छर का कुछ नहीं बिगाड़ पाए. फिर भी राज्यमंत्री भारत सरकार  का दौरा इस लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह फरवरी महीने में हो रहा है. एन्सेफलाईटिस की मौतों के सीज़न के तीन महीने पहले. केन्द्रीय मंत्री चाहें तो तीन महीने के इस वक्त का इस्तेमाल एन्सेफलाईटिस के खात्मे के लिए कर सकते हैं. लेकिन आशंका यही है कि मंत्री ऐसा करने के बजाये अपना ध्यान सिर्फ एन्सेफलाईटिस पीडतों के इलाज़ तक सीमित रखेंगे. दरअसल पिछले पांच सालों के दौरान हुआ भी यही है. सलमान खुर्शीद से लेकर राहुल गाँधी तक और राहुल गाँधी से लेकर मुलायम सिंह तक सब बारी-बारी गोरखपुर मेडिकल कॉलेज पहुँच चुके हैं. इनमे से हर एक पहले नेहरु चिकित्सालय के एन्सेफलाईटिस वार्ड में गया, फिर मेडिकल कॉलेज के कांफ्रेन्स हाल या सर्किट हाउस में अधिकारियों के साथ बैठक की. नतीजा क्या निकला. महाशून्य!
सही बात ये है कि मीडिया ने भी इन नेताओं को कभी एन्सेफलाईटिस वार्ड से बाहर की तश्वीर दिखाने की कोशिश नहीं की. वही वार्ड, वही बिस्तर, वैसे ही बदनसीब बच्चे और उनके माँ-बाप. गोरखपुर का कोई स्ट्रिंगर हो या लखनऊ-दिल्ली से आया स्पेशल रिपोर्टर. एन्सेफलाईटिस पर स्टोरी करनी हो तो उसकी शुरुआत भी एन्सेफलाईटिस वार्ड से करेगा और अंत भी वहीँ होगा. रिपोर्टर को सुविधा ये है कि उसे एक ही जगह एंकर+विजुवल+बाईट सब कुछ मिल जाता है. कई उस्ताद भाइयों ने तो इसी वार्ड में आधे-एक घंटे के स्पेशल पैकेज तक तैयार कर दिए हैं. अब जब मीडिया वाले एन्सेफलाईटिस वार्ड से आगे नहीं बढ़ रहे तो भला मंत्री-संतरी को क्या पड़ी है? फोटो तो वहीँ खिंच जाती है. बेबस मरीजों और उनके माँ-बाप के प्रति संवेदना का दिखावा भी हो जाता है. बस.... 'काम ख़त्म पैसा हज़म.'
तो क्या राज्यमंत्री भी एन्सेफलाईटिस  वार्ड में फोटो खिंचवा कर लौट जायेंगे? या फिर वाकई उनकी नीयत इस बार कुछ कर गुजरने की है. वे कर तो सकते हैं. क्योंकि अभी एन्सेफलाईटिस का सीज़न शुरू होने में तीन महीने का वक्त बाकी है. इस बीच गैर सरकारी मशीनरी ने एन्सेफलाईटिस वार्ड के बाहर ऐसा काफी कुछ किया है जिसे सरकार को जानना चाहिए. होलिया एक प्रतीक बनकर उभरा है. एक जनवरी को हम सब वहां गए थे. राज्यमंत्री  को भी जाना चाहिए. होलिया का कोई भी बच्चा उन्हें बता देगा कि एन्सेफलाईटिस का समाधान क्या है. जो हल शर्तिया तौर पर उनके लालबुझकड़ अधिकारियों की बैठक में नहीं निकलने वाला वो हल होलिया में जरूर निकल आएगा. राज्यमंत्री वहां जाते तो शायद गाँव-गाँव में एन्सेफलाईटिस उन्मूलन की बयार बहने लगती. शायद सरकार को रास्ट्रीय या प्रादेशिक स्तर पर एन्सेफलाईटिस उन्मूलन कार्यक्रम लागू करने की सदबुद्धि आ जाती और शायद अगले तीन महीने में हम सेकड़ों और बच्चों को मौत की गोद में ना जाने देने की व्यवस्था कर पाते.
 एन्सेफलाईटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कम्पेनर डाक्टर आर.एन.सिंह ने आज राज्यमंत्री को एक पत्र भेजा है. इस पत्र में डाक्टर सिंह ने नीप से कम किसी भी तरीके से एन्सेफलाईटिस उन्मूलन की असम्भाविता पर प्रकाश डाला है. डाक्टर सिंह पूर्वांचल में पिछले पॉँच साल से एन्सेफलाईटिस उन्मूलन का अभियान चला रहे हैं. उन्होंने और उनके लोगों ने हजारों चिठियाँ खून से लिखकर सरकार को भेजी हैं. ताकि वो नीप लागू करे. लेकिन एक जनवरी को जैसे ही उन्होंने होलिया में काम शुरू किया चार जनवरी को सरकार ने पहली बार उन्हें जबाब भेजा. इस जबाब में नीप के दसों  सूत्रों को सही मानते हुए भी इसके लिए किसी दीर्घकालिक योजना विशेष को गैरजरूरी बताया गया है. सरकार कहती है कि नीप के दसों सूत्र को रास्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एन.वी.बी.डी.सी.पी ) द्वारा ही देखा जा रहा है. यानी जिस बिमारी ने पिछले ३१ साल में ५० हज़ार से ज्यादा बच्चों को अपना शिकार बनाया हो, सरकार नहीं मानती कि उससे निपटने के लिए किसी अलग योजना की जरूरत है. यहाँ यह बताना जरूरी है कि सन २००८ में एन्सेफलाईटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कैमपेनर डाक्टर आर.एन.सिंह के सुझाव पर उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यछ डाक्टर रीता बहुगुणा जोशी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को साफ-साफ शब्दों में लिखकर नीप लागू करने की जरूरत बताई थी. मिशन २०१२ का दम भर रही कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में अपनी अगुआ की इस बात को कैसे नज़रंदाज़ कर दिया ये अपने आप में यछ प्रश्न है. त्रिवेदी उसी मंत्रालय के मंत्री हैं जिसने डाक्टर सिंह को ऐसा गैरजिम्मेदाराना जबाब भेजा है. डाक्टर सिंह के मुताबिक अगर रास्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एन.वी.बी.डी.सी.पी ) इतना ही कारगर होता तो बिगत चार सालों से हर साल एक ही छत के नीचे (नेहरु चिकित्सालय) में मौतों का ग्राफ  दस से बीस प्रतिशत बढ़ता ही नहीं जाता. कुछ दिन पहले ही लोकसभा में गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ ने एन्सेफलाईटिस पर सवाल उठाया था. तब इन्हीं मंत्री ने एन्सेफलाईटिस पीड़ितों से संवेदना जताते हुए कहा था कि ," वी आर ड्यूटी बाउंड टू इरेडिकेट इट."  डाक्टर सिंह सवाल उठाते हैं कि जब सरकार ईरेडिकेशन प्रोग्राम लागू करने पर सहमत ही नहीं है तो फिर आखिर मंत्रीजी अपनी ड्यूटी निभाएंगे कैसे?

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भारत मैं नक्सल समस्या का समाधान कैसे होगा

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